“क्या सरकार एक साथ चुनाव को लेकर गंभीर है या सिर्फ चर्चा चाहती है?”

चार न्यायाधीशों द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस का मसला हो या देश भर में एक साथ चुनाव कराने का… अथवा क्या हम लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली से अध्यक्षीय प्रणाली की ओर जा रहे हैं? देश में जारी वर्तमान बहस के कई मसलों पर चौपाल के चबूतरे पर अमित और त्रिवेंद्रम प्रताप सिंह ने बात की प्रख्यात संविधानविद डॉ. सुभाष चंद्र कश्यप से… पेश है चर्चा के संपादित अंश…

अमित- उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों का इस तरह मीडिया के सामने आना क्या किसी प्रक्रिया का उल्लंघन है?
यह प्रक्रिया का नहीं बल्कि परंपरा का उल्लंघन है। आज तक ऐसा नहीं हुआ था जब न्यायाधीशों ने मीडिया के सामने आकर इस तरह बयान दिया हो। माना जाता था कि न्यायाधीश अपने निर्णयों के माध्यम से ही बात करते हैं। उस दृष्टि से ये न्यायपालिका की परंपरा का उल्लंघन है। हालांकि वाक् स्वतंत्रता सभी को प्राप्त है, न्यायाधीशों को भी है। इसके बारे में कोई नियम या कानून नहीं है।

अमित- प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने कहा था कि इस दिन सभी ने मामले को सुलझाने के लिए मुख्य न्यायाधीश के पास जाकर आख़िरी कोशिश की थी। इस लिहाज़ से उन्होंने आंतरिक प्रक्रिया का पालन किया, लेकिन जब उन्हें वहां से कोई जवाब नहीं मिला तब जाकर वे मीडिया के सामने आने के लिए विवश हुए?
सिद्धांततः देखा जाए तो ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है कि मुख्य न्यायाधीश उन चारों की आज्ञा का पालन करें, उनकी इच्छाओं की पूर्ति करे। नियमों के अनुसार तो यही है कि यह मुख्य न्यायाधीश का निर्णय होता है कि, वह कौन सा मामला किस बेंच के पास भेजे।


त्रिवेंद्रम- मुख्य न्यायाधीश के बारे में कहा जाता है कि वे ‘फर्स्ट अमंग इक्वल्स’ यानी सब बराबर में पहले हैं, तो इस हिसाब से वे किसी विशेष शक्तियां नहीं रखते तो क्या इस लिहाज़ से मुख्य न्यायाधीश को उनकी बात गौर से नहीं सुननी चाहिए थी?
प्रधानमंत्री भी ‘फर्स्ट अमंग इक्वल्स’ है। लेकिन इसके बावज़ूद उनकी कुछ प्राथमिकताएं हैं। मुख्य न्यायाधीश सिर्फ न्यायालय का नहीं बल्कि देश का होता है। उन्हें भारत का मुख्य न्यायाधीश (चीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया ) कहा जाता है। ऐसे में दो बाते हैं- एक, अगर न्यायाधीशों को मुख्य न्यायाधीश से इतने मतभेद थे तो वे त्यागपत्र दे सकते थे इस नैतिक आधार पर कि मुख्य न्यायाधीश बात नहीं मानते। अगर वह ऐसा करते तो उनकी मीडिया में वाहवाही भी होती कि वे जिन क्रियायों को गलत समझते हैं उनका साथ नहीं देना चाहते थे। दूसरा, मुख्य न्यायाधीश भी कह सकते थे कि मेरे चार वरिष्ठ न्यायाधीश मुझसे सहमत नहीं हैं, तो मैं त्यागपत्र देता हूं। ऐसा ना करके पांचों न्यायाधीशों ने जनता के सामने न्यायापालिका की छवि की अच्छी मिसाल पेश नहीं की। मुख्य न्यायाधीश के सामने एक रास्ता यह भी था कि अगर वे अपने सही होने के लिए इतने आश्वस्त थे तो वे चारों न्यायाधीशों के विरुद्ध अवमानना की कार्रवाई प्रारंभ कर सकते थे। क्योंकि विधि के समझ सभी नागरिक समान हैं। यह नहीं कहा जा सकता कि अवमानना पर सिर्फ आम नागरिकों पर कार्रवाई हो सकती है, न्यायाधीशों पर नहीं।

अमित- न्यायालय में इस तरह की परिस्थितियां बनती है तो संविधान में क्या प्रक्रिया है?
संविधान में लोकतंत्र के तीन अंग हैं। न्यायपालिका कार्यपालिका और विधायिका। मीडिया को चौथा माना जाता है, लेकिन संविधान में इसका जिक्र नहीं है। इन तीनों की शक्तियां, अधिकार क्षेत्र औऱ आपस में कार्य-संबंधों का उल्लेख संविधान में स्पष्ट रूप से है। अगर उसका अनुसरण किया जाए तो कोई समस्या नहीं होगी। लेकिन असल बात तो ये है कि तीनों ही अपने कार्यक्षेत्र से बाहर का काम करते हैं। मेरे हिसाब से तीनों ही दोषी हैं।
कार्यपालिका अपने कार्यान्वयन में कमजोर है। विधानपालिका कैसे चल रही हैं, सब जानते हैं। न्यायलयों में साढ़े-तीन करोड़ मामले लंबित हैं।  कोई अपना काम ठीक से कर नहीं रहा। अगर न्यायपालिका ठीक से काम नहीं कर रही तो सासंद, विधायक, मंत्री क्या कोर्ट का काम कर सकते हैं (इस आधार पर कि एक अंग काम नहीं कर रहा)? न्यायापालिका कई बार अपने क्षेत्र से बाहर जाकर कार्यपालिका अथवा विधायिका का काम करने लगती है और उसके बचाव में कहा जाता है कि अगर दूसरे दो अंग अपना काम ठीक से नहीं कर रहे हैं, इस कारण न्यायापालिका को अधिक सक्रिय होना पड़ता है। अगर न्यायापालिका ठीक से काम ना करे तो क्या सांसद-विधायक-मंत्री कोर्ट का काम कर सकते हैं? इस तरह तो सारी व्यव्स्था चरमरा जाएगी।

अमित- …तो आपकी दृष्टि में यह मामला क्या सिर्फ अनुशासन से जुड़ा है या कुछ और है?
बहुत कुछ है लेकिन वो जनता के सामने नहीं है। प्रेस कांफ्रेंस में भी आपने देखा होगा कि चारों न्यायाधीश खुलकर बहुत कुछ नहीं बता रहे थे। वे ऐसा इशारा जरुर कर रहे थे कि बहुत कुछ ऐसा है, जो वे नहीं कह रहे।

अमित- इस व्यवस्था के पीछे कहीं न्यायाधीशों के लिए किसी आयोग (जैस एनजेएसी) का ना होना और कॉलेज़ियम व्यवस्था के दोष हैं?
इसकी मूल पृष्ठभूमि एनजीएसी के निर्णय से शुरू होती है। जिसे असंवैधानिक कहा जाता है, देखना होगा कि उसमें क्या असंवैधानिक है? यानि जो संविधान में लिखा हुआ है, उसके विरुद्ध कुछ है क्या… उच्चतम न्यायालय में भी आप हम जैसे ही देश के नागरिका हैं। उनमें भी सभी मानवीय गुण-दोष हो सकते हैं। संविधान से ऊपर कोई सुप्रीम नहीं है। संविधान के तीनों अंग अपने-2 क्षेत्र में सक्षम-सर्वोपति हैं। उच्चतम न्यायालय को दूसरे दोंनो अंगों के कृत्यों की संविधान के परिप्रेक्ष्य में व्याख्या और पुर्निक्षा करने का अधिकार है लेकिन वह विधि निर्माण नहीं कर सकता, ना ही कार्यकारी निर्णय ले सकता है। क्योंकि कुछ भी ऐसा करना संविधान के विरुद्ध होगा। उच्चतम न्यायालय अपने-आपको सभी क्षेत्रों में सुप्रीम बनाना चाहे तो यह उचित नहीं होगा। लोकतंत्र में सविधान से भी ऊपर अगर कोई है तो वह देश की जनता है। मेरे विनीत मत में एनजेएसी के मामले में उच्चतम न्यायालय का निर्णय असंवैधानिक था। संविधान में न्यायाधीशों को नियुक्त करने की प्रक्रिया के बारे में साफ़ लिखा है। इसके विरुद्ध जाकर उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया तो गलत है। ऐसी स्थिति में अगर राष्ट्रपति किसी निर्णय को असंवैधानिक होने के आधार पर ना माने और कहे कि वह संविधान की शपथ लेता है और किसी अंसवैधानिक कृत्य में भागीदार नहीं हो सकता तो इस सबका परिणाम अराजकता ही होगी, संविधान चल नहीं पाएगा। अभी तक कहा जाता था कि न्यायापालिका लोकतंत्र की अंतिम पतवार है, ऐसा कुछ नहीं होना चाहिए, जिससे लोगों का विश्वास और आदर शासन के सभी अंगों से उठ जाए।

अमित- संविधान पर विचार करते समय न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका की हिस्सेदारी हो, यह विकल्प भी सुझाया गया था, बाद में समय-समय पर राष्ट्रीय नियुक्ति आयोग के सुझाव भी दिए गए लेकिन जिस तरह सेकेंड जजेज़ केस, थर्ड जजेज़ केस  और एनजेएसी… न्यायापालिका की सुप्रीम बनाने की मंशा के बीच क्या हम उम्मीद कर सकते हैं कि एक दिन राष्ट्रीय नियुक्ति आयोग जैसा भी कुछ होगा जो न्यायाधीशों की नियुक्ति करेगा?
उम्मीद नहीं, ‘कामना’ कर सकते हैं। जैसे संसद के सदस्य अपना वेतन खुद न बढ़ाएं, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश अपने साथी न्यायाधीशों का चयन ना करें और संविधान ऊपर अपने आपको सुप्रीम न समझें। उन नियुक्तियों में जनता के हुए प्रतिनिधिक कार्यपालिका की भूमिका हो। डॉ. अंबेडकर ने इसके लिए न्यायाधीशों के लिए बहुत कड़े शब्दों का प्रयोग किया था, जिसको मैं दोहराना नहीं चाहता। दुनिया में कहीं ऐसा नहीं है कि न्यायाधीश ही अपने साथियों को चुनते हों। ब्रिटेन में भी नियुक्ति आयोग है, फिर यहाँ ऐसा क्यों किया गया है? न्यायाधीशों के महाभियोग की बात होती है। न्यायाधीश खुद भी महाभियोग की बात करते हैं, आप लोग (मीडिया) भी बिना सोचे-समझे इसका प्रयोग कर देतें हैं, जबकि संविधान में न्यायाधीशों को हटाने के मामले में ‘महाभियोग’ या इस जैसा कोई शब्द नहीं है।

अमित- राष्ट्रीय न्यायायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) का मसला हो, न्यायपालिका में जारी वर्तमान विवाद (4 न्यायाधीशों द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस हो)… इन सब पर संघ सरकार को दोष देना कहाँ तक सही है?
हमें हर मामले में देखना चाहिए कि संवैधानिक स्थिति क्या है? क्या उनका उल्लंघन हुआ है? अगर उल्लंघन हुआ है तो बिल्कुल आलोचना कीजिए आप…
अब एनजेएसी का मसला लीजिए। जैसा मैंने कहा है कि इस पर उच्चतम न्यायालय का निर्णय पूर्णतः असंवैधानिक है क्योंकि संविधान में दिया गया है कि न्यायाधीशों को कौन नियुक्त करेगा और कैसे नियुक्त करेगा? निर्णय इसके इतर है।
चार न्यायाधीशों के मामले में किसी भी सरकार को या किसी भी राजनैतिक दल को दख़ल देने की जरुरत नहीं है, बल्कि इस मामले का निपटारा न्यायायल की चारदिवारी के भीतर ही होना (इन-हाउस सैटलमेंट) चाहिए।

त्रिवेंद्रम- संविधान हम नागरिकों से कुछ अपेक्षाएं करता है। लेकिन देखा गया है कि 70 साल में भी हम नागरिकों में, यहाँ की संस्थाओं में वह सब नहीं कर पाए हैं? हमें इन लक्ष्यों को पाने के लिए क्या कर सकते हैं?
हम अंग्रेजों की बनाई औपनिवेशिक व्यवस्था को अब भी ढोये जा रहे हैं। अक़बर इलाहाबारी का एक शेर मुझे याद आता है… “मुझे नफ़रत नहीं थी अग्रेंज की सूरत से, नफ़रत थी तो उसके तर्ज़े-हुक़ूमत से” अग्रेंज तो चले गए लेकिन व्यवस्था ज्यों-की-त्यों चल रही है। हमारा संविधान अभी भी 75 फीसद से अधिक भारत सरकार अधिनियम-1935 पर ही आधारित है। यह अधिनियम भारत को बांटने और अंग्रेजी सत्ता बनाए रखने के था। लोकतंत्र में सत्ता जनता के हाथ में आनी चाहिए, पर सत्ता का हस्तांरण जनता के हाथों आज भी नहीं हुआ। शासक बदल गए पर जनता आज भी ‘प्रजा’ है। कहा जाता है कि हमने ब्रिटिश ससंदीय व्यवस्था अपनाई है लेकिन यह भी सही नहीं है। हमने ब्रिटश तंत्र नहीं बल्कि ब्रिटिशर्स का बनाया हुआ औपनिवेशिक तंत्र जारी रखा है।

त्रिवेंद्रम- क्या हमें फिर से संविधान सभा गठित करके संविधान का लगभग पुनर्निर्माण कर देना चाहिए?
काश ऐसा हो सकता! लेकिन यह संभव नहीं लगता। आज जो स्थिति है, उसमें यह संभव नहीं लगता। जब तक कोई क्रांतिकारी परिवर्तन ना हो। क्योंकि जो कथित आज़ादी हमें मिली, उसके बाद सर्वसम्मत्ति से संविधान का निर्माण हो पाया लेकिन आज तो एक छोटे से मसले पर सर्वसम्मत्ति नहीं बन पाती तो इतने बड़े काम के लिए कहाँ से सर्वसम्मत्ति बन पाएगी? यह व्यवहारिक नहीं, इसलिए बात करना ही बेमानी होगी।


त्रिवेंद्रम- इसी लिहाज़ से अगर छोटे बदलावों की बात करें तो एक साथ चुनाव कराने के मसले को कैसे देखते हैं आप, क्या यह कोई परिवर्तन ला सकता है?
यह कोई नई बात नहीं है। मैं स्वयं दो-तीन दशकों से एक साथ चुनाव कराने का सुझाव देता रहा हूँ। लेकिन एक समय विशेष में, एकदम ऐसा करने के लिए नहीं कहता। (निर्वाचन) तंत्र को सुधारने के कई पहलुओं में से यह एक पहलू है।
सिद्धांततः एक साथ चुनाव ना सिर्फ विधानसभा और लोकसभा के होने चाहिए बल्कि अंततः ग्राम-पंचायत के चुनाव भी साथ होने चाहिए। अलग-अलग चुनाव के लिए मतदाता सूची (इलेक्टोरल रोल) अलग-अलग क्यों बनते हैं? जब सार्वभौम वयस्क मताधिकार है और मतदाता पंचायत से लेकर लोकसभा तक, एक ही हैं तो अलग-2 सूचियों की जरुरत क्या है? यह तो संसाधनों का अपव्यय हुआ। यह सरकार को निर्णय करना है कि क्या वह लोस-विस चुनाव एक साथ कराने के लिए कटिबद्ध है या सिर्फ राष्ट्रव्यापी चर्चा कराना चाहती है? जहाँ तक राष्ट्रीय चर्चा की बात है तो मैं बता दूं कि वाजपेयी जी के कार्यकाल में भी यह मसला खूब जोर-शोर से उठा था। तत्कालीन उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत जी ने भी इसका समर्थन किया था। तत्कालीन उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी जी ने वक्तव्य दिया था कि “द मैटर इज़ अंडर एक्टिव कंसीडरेशन” । भारत सरकार ने एक समिति बनाई थी कि इस विषय पर देश भर में चर्चा हो। देश भर में चर्चाएं हुईं, सभा-सेमिनार हुए (उस समिति का अध्यक्ष स्वयं मैं ही था)। तो इस तरह जितनी चर्चा चाहते थे, उससे ज्यादा हो गई, सभी पक्षों/दलों के लोग आए लेकिन अंततः कुछ नहीं हुआ। अब फिर वही प्रश्न उठता है कि आप सिर्फ डिबेट चाहते हैं या कुछ करना भी चाहते हैं। अगर आप करना चाहते हैं तो कर डालिए, यह मत कहिए कि हम सभी दलों को साथ लाकर ऐसा करेंगे। यह कतई संभव नहीं क्योंकि ना सभी दल साथ आएंगे ना आप कुछ कर पाएंगे। क्षेत्रीय दल कभी नहीं चाहेंगे कि एक साथ चुनाव हों।
संविधान के पचास साल पूरा होने पर वाजपेयी जी के कार्यकाल में वैंकटचलैया आयोग भी बना, नेशनल कमीशन ऑन वर्किंग ऑन कॉन्सीट्यूशन। इसकी रिपोर्ट में भी एक साथ चुनाव की सिफारिश की गई थी, विधि आयोग ने भी इसकी सिफारिश की थी। विनय पूर्वक कहूं तो इस 11 सदस्यीय आयोग का मैं भी सदस्य था, और इसकी प्रारुप समिति का अध्यक्ष भी। इससे पहले विधि आयोग ने भी ऐसी ही सिफारिश की थी।

अमित- एक साथ चुनाव कराने के साथ एक मूल प्रश्न जुड़ा है, वह है कि अगर किसी एक राज्य में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता या त्रिशंकू विधानसभा बनती है तो क्या होगा?
सबसे पहले यह समझिए कि मेरे विनीत मत में एक-साथ चुनाव का मलतब यह नहीं होना चाहिए कि किसी एक तारीख़ को देशभर में चुनाव कराए जाएं। जैसा मैंने कहा, दो-तीन चरणों में यह संभव होगा कि लोस-विस के चुनाव हर पांच वर्ष में एक साथ हों। 2024 तक यह स्थिति आ सकती है कि लोकसभा-विधानसभाओं को चुनाव लगभग एक समय हों।
अब आपके प्रश्न का जवाब है कि ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए दो-तीन सुधार और साथ में होने चाहिए। एक, किसी भी दल को बहुमत ना मिलने की स्थिति में जापान या जर्मनी के उदाहरण से सीखते हुए पहले दिन ही ‘सदन अपने नेता’ का चुनाव करें। ऐसे में जो नेता चुना जाए, वो प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बने। इसका आशय है कि जो दायित्व अभी राष्ट्रपति या राज्यपाल पर डाला जाता है, और जिसके कारण राष्ट्रपति-राज्यपाल विवाद के घेरे में भी आते हैं, उस सबसे उन्हें मुक्ति मिलेगी। इस सुझाव का आशय है कि किसी को प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री का पदभार देने से पहले ही संबंधित सदन से पूछ लें कि उसका किस नेतृत्व में विश्वास है।
दूसरा सुझाव है कि निर्वाचित नेतृत्व को ‘रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव’ (कंस्ट्रक्टिव वोट ऑफ नो-कॉन्फीडेंस) के द्वारा ही हटाया जा सके। इससे अस्थिरता कम होगी क्योंकि हटाने पर तो लोग एकमत हो जाते हैं लेकिन जब साथ ही साथ विकल्प (सक्सेशर) चुनने को कहा जाता है तो मुश्किल पड़ती है। फिर भी ऐसी स्थिति अगर आ ही जाए कि सदन को पांच साल की अवधि पूरी होने से पहले भंग करना पड़े तो जो चुनाव हों वों शेष बचे हुए कार्यकाल के लिए हों, ना कि अगले पांच साल के लिए ताकि हर पांच साल बाद सभी लोस-विस के एक साथ चुनाव का पर्व निरंतर चलता रहे। संविधान में 5 साल का कार्यकाल ‘अधिकतम’ के रुप में दर्ज है, यानि बिना संविधान संशोधन के सदन का कार्यकाल बढ़ाया नहीं जा सकता, लेकिन न्यूनतम कार्यकाल निर्धारित नहीं है। यानि संविधान के अनुसार किसी भी सदन कार्यकाल पूरा होने से पहले सदन को विघटित किया जा सकता है।

त्रिवेंद्रम- जिस दिशा में राजनीति जा रही है, उसे देखते हुए क्या कहा जा सकता है कि हम शासन की अध्यक्षीय प्रणाली की ओर जा रहे हैं?
यह बहुत बड़ा विषय है। इस पर स्वयं मैंने बहुत कुछ लिखा है। शासन के किस तंत्र को आप अध्यक्षीय प्रणाली कहेंगे, यह निर्भर करता है। दुनिया में संसदीय और अध्यक्षीय प्रणाली के कई अलग-2 उदाहरण मौज़ूद हैं। मेरे हिसाब से भारत में भी अध्यक्षीय प्रणाली मौज़ूद है क्योंकि हमारे यहाँ भी गणतंत्र है, हमारे यहाँ भी राष्ट्रपति राज्य का प्रमुख होता है। इतना ही नहीं संविधान के अनुच्छेद 53 में वर्णित शब्दों के अनुसार “संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी” राष्ट्रपति ही तीनों सेना का अध्यक्ष होता है। हमारे राष्ट्रपति और संयुक्त राज्य अमेरिका राष्ट्रपति की शक्तियों की तुलना की जाए तो हमारे पास अधिक शक्तियां हैं। मैंने 1980 में एक लेख लिखा था, जिसमें इस बात का जिक्र किया था कि अगर पहले राष्ट्रपति नेहरु होते और पहले प्रधानमंत्री राजेंद्र प्रसाद तो, आज हम ठीक विपरीत चर्चा कर रहे होते। यानि अध्यक्षीय प्रणाली से संसदीय प्रणाली की ओर जाने की चर्चा। इसका मतलब है कि संविधान को चलाने वाले लोगों के व्यक्तित्व पर यह बहुत कुछ निर्भर है कि देश की व्यवस्था कैसी बनती है।
और अंत में याद रखिए कि अमेरिका में भी राष्ट्रपति सीधे जनता से निर्वाचित नहीं होता, वहाँ निर्वाचक मंडल (इक्टोरल कॉलेज)  जरिए निर्वाचन होता है। हमारे यहाँ भी राष्ट्रपति निर्वाचक मंडल से ही निर्वाचित होता है। यह दूसरी बात है कि हमारे यहाँ चुने हुए सांसद और विधायक निर्वाचक मंडल बनाते हैं और अमेरिका में उनका अलग से निर्वाचन होता है। महज़ दृष्टिकोण का अंतर है, शेष कुछ नहीं।

चौपाल की पाठशाला:-
संघ (Union) सरकार- संविधान में कहीं भी केंद्र (Center) शब्द का जिक्र नहीं है, लेकिन हम आम बोलचाल की भाषा में केंद्र सरकार ही उपयोग करते हैं। संविधान के अनुच्छेद-1 में लिखा है, “भारत राज्यों का संघ है”
सुप्रीम कोर्ट का सही हिंदी अनुवाद उच्चतम न्यायालय है लेकिन हम आम बोलचाल में सर्वोच्च न्यायालय इस्तेमाल कर देते हैं, जो सही नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय की अग्रेंजी Apex Court होगी।
मंत्रिमंडल (कैबिनेट)– मूल संविधान में कहीं भी कैबिनेट शब्द का उपयोग नहीं किया गया है। आम बोलचाल में हम जिस मंत्रिमंडल का जिक्र करते हैं, वह मंत्री-परिषद (Council of Ministers) है। मंत्रिमंडल, मंत्री-परिषद का ही एक छोटा भाग है। मंत्रिमंडल का सबसे पहला जिक्र 44वें संविधान संशोधन में किया गया। मंत्री-परिषद में सभी मंत्री आते हैं, जबकि मंत्रिमंडल में चुनिंदा मंत्री ही आते हैं।
महाभियोग (Impeachment)–  न्यायाधीशों को हटाने के लिए संविधान में कहीं भी महाभियोग शब्द का उपयोग नहीं मिलता। इसका जिक्र सिर्फ राष्ट्रपति महोदय के लिए किया गया है।

1 Comment


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    बढ़िया चर्चा की है।

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