चर्चा के चबूतरे पर भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई क़ुरैशी

पाँच राज्यों में चुनावी बिगुल बज चुका है। इसी बीच चुनावों में धनबल रोकने, नोटबंदी के दौर में चुनावों को कैशलेस होने की बातें भी की जा रही हैं। संघ की सरकार के मुखिया, प्रधानमंत्री जी भी कई बार चुनाव सुधारों की बात कह चुके हैं… इन्हीं तमाम मसलों को लेकर चौपाल के अनुराग धर्मेंद्र मिश्रा पहुँचे  एक समय भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे डॉ. शहाबुद्दीन याक़ूब क़ुरैशी जी के पास और दिल्ली से गुरुग्राम (गुड़गाँव) के रास्ते में उनसे, उनकी गाड़ी में इत्मिनान से चर्चा की… पेश हैं विस्तृत चर्चा के प्रमुख अंश…

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने कहा था कि ‘चुनावों में होने वाला भ्रष्टाचार, सत्ता, शक्ति और धन भूख… एक दिन ऐसा आएगा जब जनता इस सब से त्रस्त होकर कहेगी कि पुराना (ब्रिटिश) राज ही बेहतर था” क्या ये स्थिति आ चुकी है? क्या राजाजी के शब्द सच हो चले हैं?3232be33-6ce4-41f2-b24b-f76d2a982959
राजाजी की बात कितनी सही साबित हुई या हो रही है, इस बात का पता हमें 4-5 साल पहले हुए अन्ना आंदोलन से चलता है। जब राजधानी की सड़कों पर लाखों की संख्या में जनता उतरी। हांलाकि बाद में इस आंदोलन उपयोग का कुछ लोगों ने चतुराई पूर्वक अपने राजनैतिक हित साधने के लिए किया लेकिन इस आंदोलन ने ये दिखा दिया कि भ्रष्टाचार के मसले पर बर्दाश्त की एक सीमा होती है। अगर राजनीतिज्ञों ने अपने आप को नहीं सुधारा तो जनता भी चुप बैठने वाली नहीं है।
भ्रष्टाचार के मसले पर भी लोगों के दृष्टिकोण में बदलाव आ रहा है। पहले जहां बिजली चोरी या किसी सरकारी कार्यालय में एक कर्मचारी या अधिकारी द्वारा घूसखोरी करने पर अन्य साथी हंसते हुए अपनी सहमति जताते थे। वहीं आज (भले ही छोटे स्तर पर सही) इन सब चीजों को एक बुराई के तौर पर लिया जाने लगा है।
इन सब बुराईयों का कारण चुनाव है। मैं हमेशा कहता हूं कि ‘इलेक्शन इज द मदर ऑफ आल करपशन्स’ इसलिए जब तक चुनाव सुधार नहीं होते तब तक चीजें सुधारनी बेहद मुश्किल हैं। चुनाव सुधार के मसले पर जहां तक मुझे जान पड़ता है कि नरेंद्र मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण को रोकने केलिए चुनाव सुधारों की पहल की है। इसके लिए मैं उनका शुक्रगुजार हूँ।

चुनाव सुधारों की बात प्रधानमंत्री जी ने सरकार चुने जाने के बाद अपने पहले संबोधन में की थी लेकिन हुआ क्या अभी तक? सिर्फ शब्द?
मैं ऐसा नहीं मानता। कुछ हफ़्ते पहले प्रधानमंत्री जी ने अपनी पार्टी के सांसदों से कहा कि वो अपने अकाउंट की जानकारी पार्टी अध्यक्ष को दें। इससे पहले तो किसी प्रधानमंत्री ने ऐसा नहीं कहा था। इन्होंने शुरुआत तो की, पूरे सांसद न सही, अपने घर से तो शुरुआत की… फिर इसी बहाने चुनाव सुधारों की बहस भी शुरु हुई।

पूरे देश में एक साथ चुनाव हों?
एक साथ चुनाव कराने के पीछे प्रधानमंत्री ने जो तर्क दिए हैं, मैं सहमत हूँ। इसके साथ मैं दो तर्क और जोड़ना चाहूँगा। एक, जैसा मैंने कहा कि ‘इलेक्शन  फंडिंग इज द रुट कॉज ऑफ  पॉलिटिकल करपशन्स’ ये इसलिए कि जिस तरह से इसके लिए फंड इकठ्ठा किया जाता है वो भ्रष्टाचार की जड़ है तो जब पाँचों साल चुनाव होते रहेंगे तो पाँचों साल फंड कलेक्शन होगा और भ्रष्टाचार जारी रहेगा। दूसरा, चुनाव में जाति-संप्रदाय के घालमेल से सामाज में बैमनस्य का भाव आ जाता है। ये भी पाँचों साल बना रहे तो ठीक नहीं… हाँ, कुछ और मसले हैं जैसे कि एक साथ चुनावों से स्थानीय-राष्ट्रीय मसले मिक्स-अप हो जाएंगे या हो सकते हैं जो इस विचार के खिलाफ जाते हों लेकिन उन सब पर बहस हो सकती है।

राजनीति में जो गिरावट आई है, उसके लिए सिर्फ राजनेता ही दोषी हैं या जनता भी है?
राजनीति में गिरावट के लिए जनता को दोष देना ठीक नहीं। राजनेता में नेता का मतलब ही नेता है, जिससे अपेक्षा की वो आम जनता को नेतृत्व दे। ऐसे में अगर नेता ही सही राह नहीं दिखाएंगे तो जनता को दोष नहीं दिया जा सकता।

जय प्रकाश नारायण कहते थे, “लोकनीति विल प्यूरीफाई  राजनीति” इसी को ध्यान में रखते हुए 2012 विधानसभा चुनावों का एक उदाहरण लीजिए। उ.प्र. की आज़मगढ़ सीट से उच्च न्यायालय के रिटायर्ड जज साहब कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ते हैं, ये कहकर कि “राजनीति में अच्छे लोग नहीं आते, इस कमी को पूरा करने आया हूँ” लेकिन उनका जीतना तो दूर, नंबर 4 पर आते हैं… तो यहाँ तो जनता दोषी हुई?
मैं जज, साहब की बात से इत्तेफाक़ रखता हूँ। लेकिन इसके लिए फिर भी जनता को दोष नहीं दूंगा। दरअसल सिस्टम इतना गंदा हो गया है कि अच्छे व्यक्ति भी हार जाते हैं। आजकल सिर्फ स्वच्छ छवि ही पर्याप्त नहीं, बेतहाशा पैसे का इस्तेमाल, लोगों की बीच आपकी पहचान, मीडिया में पहुँच… सब के सब कही अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं।

विधानसभा या लोकसभा चुनावों में जो खर्च की सीमा है, वो कई गुणा पार हो जाती है। इसे आपने स्वीकार किया है। ऐसे में प्रशासन कुछ करना नहीं चाहता या वोझ के कारण कुछ कर नहीं पाता?
ये सीमा पार होती है। दस गुणा तक पहुँचती है। लेकिन नियंत्रण के मामले में ऐसा नहीं है। अन्य विभागों का तो मुझे पता नहीं लेकिन आयोग हर संभव कोशिश करता है कि चुनाव खर्च की सीमा नियंत्रण में रहे। जहां तक सीमा पार होने की बात है, तो इसमें काले धन की भूमिका है और काला धन पूरी दुनिया की समस्या है। ये चूहे-बिल्ली का खेल है। कभी हम पकड़ पाते हैं तो कभी खाली रह जाते हैं।

काले धन की समस्या से निजात पाने के लिए सब कुछ कैशलेस हो सकता है चुनाव क्यों नहीं हो सकते?
हांलाकि अभी चुनाव आयोग ने चुनावों में बीस हजार से अधिक लेन-देनों को चेक या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भुगतान करने के निर्देश दिए हैं, लेकिन मुझे लगता है कि चुनाव आयोग ने चुनावों को कैशलेस करने का एक बहुत अच्छा अवसर गंवा दिया क्योंकि एक तरफ सरकार जहां सब्जी और रिक्शे वाले से भी कैशलेस होने की अपील कर रही है और उसे बढ़वा देने के लिए बकायदा कार्यक्रम चला रही है तो चुनाव आयोग के पास ऐसा कोई कारण नहीं दिखता जो उसे कैशलेस होने से रोके। इसलिए मुझे लगता है कि इलेक्शन कमीशन ने बड़ा अच्छा मौका छोड़ दिया।

तकनीक और आधार का बढ़ता हुआ प्रयोग, अब तो अंगूठा लगाइए और पैसे ट्रांसफर… तो फिर ऑनलाइन वोट क्यों नहीं?
ऑनलाइन वोटिंग का हम दो कारणों से समर्थन नहीं करते। एक तो टेक्नोलॉजी (कनेक्टिविटी) का कोई बहुत ज्यादा भरोसा नहीं है। दूसरा कारण ये कि इंटरनेट पूरी तरह हैक प्रूफ नहीं है। जब अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश में पेंटागन का डेटा हैक किया जा सकता है। राष्ट्रपति चुनावों को हैक किया जा सकता है तो हमारी तो हैसियत ही क्या है? इसलिए एक सुरक्षित लोकतंत्र के मामले में इस तरह के विचार का मैं विरोध करता हूँ। ये तो हुए तकनीकि कारण… एक अन्य कारण ये है कि मान लीजिए आपके यहां ऑनलाइन वोटिंग की सुविधा है, तो कोई अपराधी या गुण्डा किस्म का व्यक्ति आपके कनपटी पर पिस्तौल रखकर या पैसों का लालच दिखाकर वोट डलवा सकता है तो ऐसी स्थिति में हम लोगों को कैसे सुरक्षा दे पाएंगे।

पेड न्यूज़ का मामला कितना चुनौतिपूर्ण है? चुनावों के दौरान ऐसी रिपोर्टिंग होती है कि आम नागरिकों की तो छोड़िए, अच्छे-अच्छे लोग भी इसमें चकरा जाते हैं और शायद ही ये अंदाज़ा लगा पाएं कि ये असली ख़बर नहीं।
देखिए पेड न्यूज़ के मसले पर सभी शामिल होते हैं। क्या पक्ष और क्या विपक्ष? इस पर आयोग चाह कर भी बहुत कुछ नहीं कर सकता क्योंकि हमारे पास भौतिक रूप से तो कुछ दिखाने के लिए तो होता नहीं है। पेड न्यूज़ के मामले में लेने वाले और देने वाले दोंनों ही सहमत और खुश होते हैं। ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग क्या कर सकता है? आचार संहिता में हम मीडिया पर नजर रखने के लिए जिलेवार समितियां भी बनाते हैं। दअरअसल इसमें एक वर्किंग जर्नलिस्ट भी रहता है क्योकिं पेड न्यूज़ के अधिकतर मामले सीधे मीडिया मालिक (मीडिया ओनर) से संबंधित होते हैं। पेड न्यूज़ रोकने के लिए हमारी मांग रही है कि इसे आपराधिक दोष करार दिया जाए न कि सिर्फ चुनावी गड़बड़ी। आपराधिक दोष घोषित होने के बाद हो सकता है कि डर के कारण इसे कुछ हद तक रोका जा सके।

आपने अपनी किताब में मीडिया को 5वां कॉलम  बन जाने की संभावना जताई है, इसका मतलब?
न्यायपालिका की तरह मीडिया भी लोकतंत्र का पहरेदार (वाचडॉग) है। लेकिन अगर पहरेदार ही पैसे लेकर किसी को भी अंदर आने दो तो उसे दगाबाज़ 5th कॉलम कहेंगे।

आचार संहिता में टीवी या प्रिंट मीडिया पर तो नियंत्रण के लिए आप कोशिश करते हैं लेकिन सोशल मीडिया… नियंत्रण होना चाहिए?
निश्चित रुप से होना चाहिए। सोशल मीडिया भी मीडिया है, तो जाहिर है इसके साथ भी अन्य मीडिया नियमों के अधीन कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन मेरे इस विचार के आलोचकों का कहना है कि सोशल मीडिया पर नियंत्रण संभव नहीं है और वह इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन सिद्ध करने लगते हैं, तो मैं कहना चाहूंगा कि कठिन तो अपराधियों और आतंकवादियों को पकड़ना भी होता है तो क्या हम इनके लिए कानून नहीं बनाते?

महिलाओं को चुनाव में मुखौटे की तरह उपयोग किया जाता है, उनकी वास्तविक भागीदारी नहीं होती। जहाँ शिक्षा का इससे कोई संबंध है तो केरल में साक्षरता सबसे अधिक है लेकिन महिलाओं विधानसभा में हिस्सेदारी बहुत कम… ऐसा क्यों है?
जब से हमने मतदाता जागरुकता अभियान शुरू किया है, तब से महिलाओं का मत प्रतिशत पुरुषों की अपेक्षा अधिक हुआ है। इसका उदाहरण न सिर्फ आप केरल में देख सकते हैं बल्कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में भी देखा जा सकता है। एक दौर में चुनावों में हिंसा हुआ करती थी, जिसकी सबसे ज्यादा और आसान शिकार महिलाएं होती थीं। एक तरफ महिलाओं की मतदान में अधिक भागेदारी है लेकिन वो उसी अनुपात में चुनकर नहीं आतीं तो इसके लिए राजनैतिक दल दोषी हैं, जो महिलाओं को उचित संख्या में टिकट ही नहीं देते। पिछले लोकसभा चुनावों में राजनैतिक पार्टियों ने 6 प्रतिशत महिलाओं को टिकट दिए थे लेकिन अंतिम रूप से चुनीं गईं महिलाओं की संख्या 9 प्रतिशत थी। इसका मतलब है कि आम लोगों को महिलाओं को चुनने की कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन अगर आप पंचायत स्तर को इसमें शामिल करेंगे तो आप गलत हैं क्योंकि वहां अधिकतर राज्यों में 33 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी गईं हैं। कुछ राज्यों में तो ये प्रतिशत 50 फीसदी तक पहुंच गया है। इसीलिए पंचायत वाली संकल्पना को हमें लोकसभा और विधानसभा में भी अपनाना चाहिए। जहां से होकर एक महिला प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री तो बन सकती है लेकिन विधायक या सांसद नहीं बन सकती।

एक व्यक्ति दो जगह से चुनाव लड़ता है, दोनों से जीतता है और फिर एक छोड़ देता है। क्या ये संसाधनों का अपव्यय नहीं, क्या ये एक क्षेत्र की जनता से धोखा नहीं? फिर रोक क्यों नहीं?
मैं सौ फीसदी सहमत हूँ। लेकिन ये चीजें विधायिका को ही बनानी हैं। चुनाव आयोग सिर्फ मांग कर सकता है सलाह दे सकता है। हमने ऐसी मांग की भी है। डेढ़- दो दशक पहले एक व्यक्ति दो से अधिक सीटों जगहों से चुनाव लड़ सकता था। ये तो आयोग की मांग का ही असर था जो इसे दो तक सीमित किया गया। इसमें हमारी मांग का एक पहलू ये भी है कि जीती हुई एक सीट छोड़ने पर उस सीट पर हुए चुनावों का आधा खर्च छोड़ने वाले से वसूल किया जाए।

पिछले डेढ़-दो दशकों में देखा जाए तो जो भी चुनाव या राजनैतिक सुधार हुए हैं, वे सब न्यायपालिका की ओर से आए हैं। ऐसे में क्या हमें विधायिका से सुधारों की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए?
देखिए मैं विधायिका के लिए इस सवाल पर बेहद कठोर शब्द कहना चाहूंगा लेकिन आपके सामने नहीं करूंगा। इसे मैं तो थोड़ा हल्का करके ‘गुस्ताख़’ कहूंगा। क्योंकि जैसा आपने कहा पिछले दो दशकों में हुए चुनाव सुधार न्याय पालिका से आए हैं और विधायिका ने इस मसले पर आम जन इच्छाओं को पूरी तरह अनदेखा किया है। फिर न्यायपालिका द्वारा किए गए इन सुधारों के लिए कुछ लोग न्याय पालिका की आलोचना भी करने लगते हैं, तो मैं इन आलोचकों से कहूंगा कि जो काम आप नहीं कर रहे हैं, तो वो कोई और तो करेगा। राजनीतिज्ञों को ये समझना चाहिए कि जनता (अन्ना आंदोलन के दौरान)अपनी शक्ति जान चुकी है। अगर वे नहीं सुधरे तो गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

भारत युवा हो रहा है लेकिन 18 से 22 साल के युवाओं के बीच मतदाता पंजीकरण का प्रतिशत मात्र 12…? किस दिशा में जा रहे हैं ये युवा जो हर काम करना चाहते हैं सिवाय मतदाता बनकर मतदान करने के?
ये समस्या कुछ समय पहले हुआ करती थी। लेकिन इसका हल खोजने के लिए हमने राष्ट्रीय मतदाता दिवस (नेशनल वोटर्स डे, 25 जनवरी) शुरू किया। जिसके पीछे उड़ीसा में एक व्यक्ति का विचार (आइडिया) मूल आधार था, जिसमें उसने सुझाया था कि द ऐज ऑफ एट्टीन सुड बी द एज ऑफ सेलिब्रेशन। हमने इस पर पहल की कि जो भी युवा 1 जनवरी को 18 साल के होंगे उन्हें 25 जनवरी के दिन हाथों-हाथ मतदाता कार्ड ( वोटर आईडी) दे दिया जाएगा। इसका पहल का ये असर हुआ कि अब 18 से 22 की आयु में एनरॉल्मेंट बढ़कर 75 से 80 फीसदी हो गया।

राइट टू रिकॉल की मांग पर आयोग ने कभी विचार किया क्या भारत में ये संभव है?
राइट टू रिकॉल पर चुनाव आयोग ने विचार नहीं किया है लेकिन ये मेरा मानना है कि ये भारत के परिपेक्ष्य में कतई संभव नहीं है। हमारे पास पहले से ही राइट टू रिकॉल है जिसका उपयोग हर पांच साल में करते हैं। अगर ये हर 15 दिन और महीने भर में होने लगे तो देश में अस्थिरता आ जाएगी क्योंकि हारने वाले लोग हमेशा राइट टू रिकॉल लिए खड़े रहेंगे। फिर राइट टू रिकॉल के लिए कितने लोगों की आवश्यकता होगी ? मान लीजिए किसी को 5 लाख 90 हजार वोट मिलते हैं तो उसके लिए 6 लाख हस्ताक्षर? इनकी विश्वसनीयता क्या होगी? इसलिए राइट टू रिकॉल का विचार भारत में संभव नहीं। टीम अन्ना ने मुझे इसका सुझाव दिया था, तो मेरा स्पष्ट रूप से कहना था कि इसके बाद बार बार चुनाव कराने पड़ जाएंगे जो संभव नहीं।

अधिक मतदान को स्वस्थ चुनावों का एक पैमाना माना जाता है। इससे लोकतंत्र भी अधिक मजबूत बनकर उभरता है, फिर अनिवार्य मतदान क्यों नहीं?
मैं इसके एकदम खिलाफ हूं क्योंकि अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता में वोट देना भी शामिल है और वोट न देना भी। हम मतदान प्रतिशत को प्यार से लोगों को समझा-बुझाकर बढ़ाना चाहते हैं न कि डण्डे के बल पर… हमारे यहां कुछ राज्यों में मतदान प्रतिशत 93 तक पहुंच गया है।

नोटा (NOTA) आया फिर तो मतदान न करने का कोई बहाना नहीं होना चाहिए? मतदान न करने पर कुछ सुविधाओं से बंचित कर दिया जाए?
ये बात ठीक है कि जब से नोटा आया है तब से मतदान न करने का कोई कारण शेष नहीं रह जाता। सर्वोच्च न्यायालय ने भी नोटा के फैसले में कहा था कि आप मतदान करने जरुर जाइए। लेकिन इस कारण अनिवार्य नहीं किया जा सकता क्योंकि इलाके के दबंग (कम्युनिस्ट/नक्सली ऐसा करते हैं) अगर किसी को वोट डालने से रोकते हैं तो फिर जुर्माने के तौर पर गरीब मतदाता की अन्य सुविधाएं भी चली जाएंगी। अब ऑस्ट्रेलिया का उदाहरण लीजिए वहाँ वोट न करने पर 20 डॉलर का जुर्माना है तो इसे बसूल करने में 2000 डॉलर खर्च हो जाते हैं, फिर न्यायपालिका पर मुकद्दमों का बोझ अलग से बढ़ेगा। जहाँ अनिवार्य मतदान है उन देशों में भी 90 फीसदी ही मतदान होता है जबकि हमने प्यार से समझाकर इसे 93 तक कर लिया!

आपने आम आदमी पार्टी की कार्यप्रणाली है, उसकी तारीफ़ की है, खासकर फंडिंग को लेकर… आज भी आप आम आमदी पार्टी के लिए वही राय रखते हैं?
आम आदमी पार्टी ने शुरूआत में निश्चित रुप से फंडिंग के मामले में जो नीति अपनाई थी, उसकी मैंने तारीफ की थी लेकिन (फंडिंग को लेकर) अभी जो उन्होंने किया उसकी आलोचना बनती है। लेकिन इसके साथ ही पार्टी द्वारा इसके पीछे क्या कारण दिए जा रहे हैं, इस पर भी गौर किया जाना चाहिए और इसके साथ अन्य राजनीतिक दल आप की जो आलोचना कर रहे रहे हैं, उनसे भी पूछा जाना चाहिए कि फंडिंग को लेकर उनके यहाँ कितनी पार्दर्शिता है?

क्या सरकारी खर्चे पर चुनाव संभव हैं? (इलेक्शन फंडिंग)
नहीं, मैं इसका एक अन्य विकल्प सुझाता हूँ। इलेक्शन फंडिंग में हमें हर उम्मीदबार को 28 लाख (विधानसभा) या 70 लाख (लोकसभा) देने होंगे तो फिर तो (पैसों के लालच में) हर कोई चुनाव लड़ने लग जाएगा?
इसकी जगह पॉलिटिकल पार्टियों को सीधे फंड दिया जाए। जिसमें 100 रुपए प्रति बोटर के हिसाब से भुगतान किया जाए। इस हिसाब से चुनाव आयोग को पाँच सालों में करीब 5500 करोड़ का भुगतान करना पड़ता जो कि इन सभी पार्टियों को मिले कुल चंदे से लगभग एक हज़ार करोड़ अधिक है!

आचार संहिता के मामले में चुनाव आयोग को टूथलेस कहा जाता है, जो कहता तो बहुत है लेकिन कुछ संहिता के खिलाफ जाने वाले पर बहुत कुछ नहीं कर पाता?
देखिए, चुनाव आचार संहिता (मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट) के अंतर्गत जो भी शक्तियां आती हैं, उनका हम पूरा उपयोग करते हैं। इसमें एक बात समझनी होगी कि किसी बड़े नेता को चेतावनी देना कम नहीं माना जाना चाहिए। आयोग की इस चेतावनी से ही उसकी छवि जनता की नज़र में गिर जाती है।

जब आप आयुक्त हुआ करते थे तो हाथियों को ढकने को लेकर आयोग के फैसले की आलोचना भी हुई थी और इस निर्णय का लोगों ने मजाक भी खूब उड़ाया था। क्या विकल्प सीमित थे आपके पास?
जहाँ तक हाथियों को ढकने की बात है तो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद हम बसपा का चुनाव निशान छीन सकते थे लेकिन हम थोड़े उदार हुए और हमने सिर्फ उन्हें ढकने का फैसला किया। अब ये भले किसी को अटपटा लगे लेकिन हमें तो अपना काम करना है। सबको लेबल प्लेइंग फील्ड देना था। इसके पास हमारे पास जिन पार्कों में मूर्तियां लगी हैं, उन पर ताला लगाने विकल्प था। लेकिन ऐसी स्थिति में कोई आम नागरिक न्याायालय पहुँच जाता और पार्क में टहलने के अपने अधिकार के हनन का दावा कर सकता था।
जब हम प्रधानमंत्री बाजपेयी साहब की तस्वीरें उतरवा सकते हैं तो हाथियों का ढकने में किसी को आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए। इन हाथियों को (लखनऊ और नोएडा) ढकने में लगभग सिर्फ 3 लाख रुपए ही खर्च हुए थे।

सरकार 1 फरवरी को बजट पेश करेगी और फिर तीन-चार दिन बार 5 राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं। पिछली सरकारों की तरह इस बार सरकार का रुख क्या होना चाहिए?
इस मामले में सरकारों को थोड़ा उदार रवैया अपनाना चाहिए। जो चीज सत्तर साल से फरवरी के अंत में हो रही है उसे एकदम पीछे कर देने से बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं आ जाएगा। आचार संहिता में भी ये अपेक्षा है कि सरकार ऐसा कुछ नहीं करेंगी जिससे चुनावों में उन्हें एकतरफा लाभ मिलने की गुंजाइश हो। हालांकि सरकार ने अगर (बजट की तारीख बदलने की) पहले भी इसकी घोषणा कर दी थी तो भी चुनाव करवाने के की दृष्टि से वह पर्याप्त नहीं थी। अगर पिछली सरकार ने ऐसी स्थिति में बजट मार्च में दिया था तो ऐसे उदाहरणों का अनुसरण होना चाहिए।

2014 का लोकसभा चुनाव राष्ट्रपति प्रणाली पर लड़ा गया जिसमें प्रत्याशी कौन है, ये गायब था। इससे कहीं न कहीं लोकसभा में चुनकर गए जन-प्रतिनिधि अप्रासंगिक हो गए हैं?
राष्ट्रपति प्रणाली तो कभी हमारे यहाँ नहीं आ सकती क्योंकि संसदीय प्रणाली आधारभूत संकल्पना है और आधारभूत संकल्पना से कोई छेड़छाड़ संभव नहीं। हाँ, ये बात सही है कि 2014 का आम चुनाव जिस तरीके से लड़ा गया, उसमें स्थानीय प्रतिनिधि अप्रासंगिक हो गए हैं। इस बार गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
अभी हाल ही में न्यायालय ने फैसला दिया है कि जाति या संप्रदाय से संबधित किसी भी चीज का राजनीतिक दल उपयोग नहीं कर पाएंगे। ऐसे क्या शिवसेना, अकाली दल, मुस्लिम लीग या असदुद्दीन औवेसी की एमआईएम पर कुछ गाज़ गिर सकती है?
एक तो सर्वोच्च न्यायालय का ये फैसला एकदम शून्य में नहीं आया। साल 1991 में न्यायालय ने ऐसा एक फैसला दिया था। फिर इसे लागू करने में भी बहुत समस्या है। कहाँ आप रेखा खीचेंगे?
दूसरी बात, मेरा मानना है कि आयोग इसमें उदार रुख अपनाते हुए भविष्य के लिए न्यायालय के इस फैसला को संज्ञान में लेगा। जो पार्टियां पहले से चली आ रही हैं, उनपर शायद ही कोई कार्यवाही की जाए।

दुनिया भर की लोकतांत्रिक सरकारों के प्रति लोगों में अविश्वास के भाव बढ़ रहा है, आपकी ही किताब में लिखा है कि सिर्फ एक तिहाई लोग मानते हैं कि सरकार लोगों की इच्छा से चलती है। दस में से सिर्फ एक व्यक्ति अपनी सरकार से संतुष्ट था। इस स्थिति के लिए किन कारणों को दोष देंगे आप?
मोरल अथॉरिटी। पहले जहाँ एक पुलिस वाला एक हज़ार की भीड़ को सिर्फ डंडे के बल पर संभाल लेता था, आज वही काम सैंकड़ों पुलिस वालों को करना पड़ रहा है। पुलिस स्वयं पिट रही है।
लोग संस्थाओं से निराश हो चले हैं इसीलिए अपराधी लोग चुनाव जीत रहे हैं। आम जनता के झगड़े कानून-न्यायापालिका द्वारा सालों में निपटाए जाते हैं, अपराधी से विधायक-सांसद बने प्रतिनिधि उन्हें एक फोन पर निपटा देते हैं।

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3 Comments


  1. // Reply

    बेहद उम्दा अनुराग
    सीधे और संतुलित सवाल


  2. // Reply

    बेहद उम्दा अनुराग
    सीधे और संतुलित सवाल


  3. // Reply

    बहुत ही उम्दा तरीके से लिया गया साक्षात्कार…
    सभी मुख्य विषयों को संज्ञान में रखकर प्रश्न किये गए और उनके जवाब भी सहमत करने वाले मिले।

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