किसान और कृषि के नज़रिए से 500 और 1000 के नोट

–केदार सिरोही  (@KedarSirohi)

सैद्धांतिक रूप से यह बात सही लगती है कि पुराने नोट हटाकर आप नए नोट चलन में लाएं तो अर्थव्यवस्था से कालाधन निकाल सकते हैं लेकिन हिंदुस्तान एक जटिल अर्थव्यवस्था है जहां छोटे कारोबारी हैं, गांव में किसान और मजदूर लोग हैं, उनका क्या होगा. बैंकिंग व्यवस्था बेहद कमजोर है जिसके कारण  देश के एक बहुत बड़ा तबका बैंक से दूर है और जुड़ा तो भी कुछ अंश तक होगा क्योंकि आज भी ग्रामीण लोग अपना लेन देन नगद में करते है. 


आज किसानो के यहां बड़ी मात्रा में नगदी है उसके कारण हैं पहला फसलों की बिक्री जो कि नगदी में की है, दूसरा जो कर्ज बैंक और साहूकार से फसल बोने और शादी विवाह के लिए रखे हैं तीसरा किसानों का आपसी लेनदेन भी नगदी है जो) और ख़राब समय के लिए एकत्रित जमा पूंजी जिसके कारण उनके पास नगदी की मात्रा है जिसको बाजार में लाने से उनको नुकसान ही होगा. अब नोट बंद करने पर आपको,आपके बच्चे की गुल्लक और लेन देन का भी आय का स्रोत बताना पड़ेगा जबकि देश में सभी को मालूम है की औसतन ₹ 20 हजार रूपये किसानो की वार्षिक आय और ₹ 50 हजार का कर्ज है बाकि विशेष काला धन बाहर नहीं आयेगा, किसानों को कागजी खानापूर्ति ज्यादा करनी होगी. किसानों और गरीबों की अवाक जावक पूरी नगदी में है जब किसान फसल बेचता है तो नगद और भुगतान करता है तो नगद इसके साथ कुछ बचाकर वर्ष का खर्चा चलने के लिये रखता जिसके सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव रहे जिसमें सन 2008 की विश्व मंदी का असर हमारे देश पर नहीं पड़ा क्योंकि ग्रामीण और किसान अर्थव्यवस्था मजबूत और बचत करने वाली थी, नकारात्मक यह कि आज हमारी जीडीपी 1.7 ट्रिलियन की है उसका वास्तविक मूल्यांकन नहीं हो पाया है क्योंकि वस्तु के बदले वस्तु खरीदी का चलन आज भी बड़ी मात्रा में है जो कि जीडीपी का हिस्सा नहीं बन पा रही है. छोटे स्तर पर नकदी अर्थव्यवस्था ही चलती है.

आखिरकार इस पुराने नोट के सर्जिकल की जरुरत क्यों पड़ी इसका प्रमुख कारण यह है की कालाधन, आतंकवाद, बैंक लेन देन का कम उपयोग होना ,अर्थव्यवस्था का धीमा होना, गरीबी अमीरी में गेप अधिक होना, इसका मतलब यह नहीं है कि इससे ब्लैक मनी की समस्या खत्म हो जाएगी और सरकार को टैक्स मिल जाएगा. मुझे लगता है कि सरकार की कोशिश लोगों को बैंकों से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित करने की है. भारत में बहुत से लोग नकदी का लेन-देन करते हैं सरकार ने जन-धन योजना में करोड़ों लोगों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ा है लेकिन इन खातों का लगभग 20 फीसदी ही ऑपरेशनल है. मुझे लगता है कि इससे लोगों में बैंकिंग व्यवस्था से जुड़ने का रुझान बढ़ेगा. लोग अपनी नकदी बैंकों में जमा करेंगे.

बड़े उद्योगों के पास तो सारी सुविधाएं होती हैं, वे इससे निपटने के लिए रास्ता निकाल लेंगे क्योकि अच्छे सी ए उनके पास है. उन्हें जो भी हेरा-फेरी करनी होगी कर लेंगे. मुझे लग रहा है कि अगले दो-तीन महीने में हर तरफ अफरा-तफरी का माहौल होगा. एक ऐसे समय में जब अर्थव्यवस्था सुस्त है, लोग कम खर्च करेंगे, उपभोग पर असर पड़ेगा. इस फैसले का बड़ा सकारात्मक प्रभाव आने का कोई स्पष्ट रास्ता नजर नहीं आता है. मसलन किसी के पास एक करोड़ नकदी कालाधन है तो वह हजार लड़कों को इकट्ठा करके कहेगा आप बैंक जाकर इसे बदल लाओ. छोटी-छोटी रकम के जरिए ये किया जा सकता है. यह एक तरह से बिना टैक्स लिए पिछले दरवाजे से छूट देने का रास्ता भी हो सकता है. हिंदुस्तान में लोग ऐसे पैंतरे अपना सकते हैं. साथ ही ऐसी संभावना है कि मांदिरो या अन्य संस्थानो के माध्यम से कालाधन  को सफ़ेद  करने का गोरख धन्दा देश में बढ़ेगा जिसका पुख्ता इंतजाम अभी किसी के पास नहीं है.

सरकार ने ₹ 500-1000 रुपए के नोटों को बंद करके ₹ 500 और ₹ 2000 रुपए के नए नोट निकालने का फैसला किया है. इससे महज 4 घंटे में ही देश की 87% यानी ₹ 15 लाख करोड़ रुपए की करेंसी इकोनॉमी से बाहर हो गई. ₹ 2000 रुपए का नोट लाने का फैसला पहली बार किया गया है. हालांकि हाई वैल्यू नोटों को अचानक बंद करने का यह कोई पहला फैसला नहीं है. इससे पहले भी 1946 और 1978 में ऐसे फैसले किए गए थे. अब तक सबसे ज्यादा मूल्य का ₹ 10 हजार रुपए का नोट पहले 1938 में, फिर 1954 में छापा गया था. लेकिन इस नोट को जनवरी 1946 और फिर दोबारा जनवरी 1978 में (38 साल पहले) बंद कर दिया गया था. अभी 500 रुपए के 1650 करोड़ नोट चलन में हैं. यानी ₹ 8.25 लाख करोड़ रुपए. इसी तरह ₹1000 रुपए के ₹ 670 करोड़ नोट चलन में हैं. यानी ₹ 6.70 लाख करोड़ रुपए.जबकि 1987 में आया था ₹  500 रु. का नोट और एक हजार रुपए का नोट नवंबर सन 2000 में वापस लौटा था.

इस बात का बड़े पूंजीपतियों को पहले से पता रहता है, इसलिये ये लोग अपना पैसा सोने, शेयर बाजार, प्रापर्टी और विदेशी करेंसी में तब्दील कर ही रखते हैं, 2016 में कानून आया था ,सबने सोचा कि अब सारा कालाधन बाहर आयेगा,लेकिन 30 सितम्बर 2016 को यह स्कीम बंद हुई और इसमे ₹ 67 हजार करोड़ आये इस स्कीम के तहत आपना काला धन दर्शाकर वाइट कर लिया गया, इसके तहत आय का स्रोत नहीं पूछा गया,चाहे वो किसी भी तरीके से अर्जित किया गया हो, जिसके कारण बड़े मागार्मछ इसका पूरा फायदा उठा गये बाकि गरीब, किसान ,मजदूर और माध्यम वर्ग रह गए.

इसी कारण सोने के भाव आसमान को छू रहे है. दूसरी तरफ किसानों और मजदूरों को इसका नकारात्मक प्रभाव यह पड़ेगा की मंडी में किसानों की फसलो का भाव अभी वैसे ही कम है और अब 4 से 6 माह तक बाजार भाव में तेजी की सम्भावना बिलकुल ख़त्म हो गई है क्योंकि कृषि जिंसो के व्यापारियो का लेनदेन भी अधिकतर नगद में है. दूसरा प्रभाव रियल स्टेट का शेयर 20% गिरने की खबर है जिसके कारण कृषि भूमि की कीमत भी अब बाजार में आधी रह जाएगी जो किसान कर्ज में उनको अब दुगनी जमीन बेचनी पड़ेगी जिससे कार्पोरेट को सस्ती जमीन मिलेगी और किसान का नुकसान होगा.

जिन लोगों को लगता है कि कालाधन बाहर आयेगा उसमें  समय लगेगा क्योंकि मोदीजी  ने ₹ 500-1000  के चल रहे नोट पर रोक लगा दी है. अब जो धन्ना सेठ काला धन जमा किये बैठे हैं उनके पास एक ही तरीका है कि वो किसानों को कहेंगे कि तुम अपनी कर्जे की लिमिट भर लो . पैसा सेठ देगें और बाद में किसान के जरिए वही पैसा बैंक मे सें वापिस निकाल लेगें. क्योंकि आज देश के किसानों पर ₹ 7 से ₹ 8 लाख करोड़ का कर्ज बैंक का है जो की कुल नोटों का 50 % हिस्सा है,मान लो एक सेठ के पास दस किसान हैं और उन पर दस-दस लाख का कर्जा है तो उस सेठ का किसान के जरीए एक करोड़ रुपए एक नंबर मे हो जाएगा . इसी तरह 6.5 लाख लोगो ने सन 2011-12 में ₹ 2 लाख करोड़ की आय कृषि से दिखाई गई जो की कुल जीडीपी का 25 गुना था, इसी तरह के आकडे़ इन दिनों किसानों और गरीबों के नाम दिखाई देंगे जिससे किसान करोड़पति जरुर दिखेगा परन्तु वास्तव में कर्ज पति रहेगा इस कारण गलत नीति निर्धारण की चपेट में आयेगा है.क्योंकि पिछले वर्ष देश के करोड़ों किसानों को आयकर विभाग द्वारा नोटिस दिया गया था जिसमे उनसे आय की पूछी गई थी .

देश में कालेधन पर बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा अलग-अलग प्रतिक्रिया दी गई. इस कदम को सरहानीय कदम बताया गया मेरा मानना है की यह अर्थव्यवस्था का अस्थाई इलाज ही रहेगा. इसका कुछ दिनों तक कई जगह सकारत्मक प्रभाव भी दिखेगा जैसे जो डेड मनी पड़ी उसका बाजार में फ्लो बढे़गा, आतंकवाद को वित्तीय सहायता कम हो जाएगी, नकली नोटों का कारोबार एक दो वर्ष ठप हो जायेगा, कुछ महीनो के लिए हावाला का पैसा कम काम करेगा अधिकारियों और नेताओ की रिश्वत का पैसा सोने और जमीन में इन्वेस्ट हो जायेगा.परन्तु कालाधन और भ्रष्टाचार कम नहीं होगा क्योंकि यह प्रक्रिया हमारे देश में तीसरी बार 2016  में की गई है. पिछली दो बार में हमारे देश में कोई विशेष अंतर नहीं आया इसी प्रकार की प्रतिक्रिया अमेरिका चाइना सिंगापुर और ब्रिटेन ने भी की थी परंतु उन्होंने बड़े नोटों को खत्म करने के साथ साथ में तुरंत ई ट्रांजैक्शन को बढ़ावा दिया जिससे वहां पर काले धन पर काफी हद तक रोक लगा दी गई है. यही चीज हमारे देश में करनी होगी कि जब तक हम ही ई पेमेंट को नहीं बढ़ावा देंगे तब तक हम यह काला धन नहीं रोक पाएंगे.

सरकार द्वारा 2000 का नोट निकलना भी गलत निर्णय है, क्योंकि देश में आज भी 70% किसान और गरीब  है जिनके नाम पर देश में जितना काला धन है उसका 10 गुना ज्यादा सफ़ेद करने की क्षमता है .कालाधन के जागीरदार जिनके ख़राब होते नोट पुनः नए हो जायेंगे और कुछ दिनों बाद सन 1946 ,और 1978 की तरह कालाधन अपना रास्ता बना लेगा. इसमें जितना शोरगुल हो रहा है उतना फायदा अर्थव्यवस्था को नहीं होगा कदम सराहनीय परंतु इस को उपयोगी बनाने के लिए ई पेमेंट करना जरूरी है

सरकार द्वारा इस तरह की योजना के लिए कुछ महत्वपूर्ण तैयारी करनी थी क्योंकि अगले कुछ दिन 13% करेंसी से इकोनॉमी चलेगी जिससे, बाजार में नगदी की कमी आएगी और जिसका हर्जाना किसानों को फसलों को बेहद कम भाव में बेचकर उठाना पड़ेगा इसके लिए सरकार द्वारा तुरंत समर्थन मूल्य पर सभी फसलों की खरीदी चालूकर देना चाहिए जिससे किसानों को उनकी उपज का वास्तविक मूल्य मिल सके .

क्योंकि अभी देश पर अमेरिका चुनाव का भी असर आयेगा इन दोनों घटनाओ के कारण इक्विटी बाजार में करीब 5 से 8 लाख करोड़ की नुकसान का अनुमान जानकर लगा रहे है .

तमाम बातों के बीच हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि सरकार ने ₹ 500-1000 के नोट बंद कर , ₹ 2000 और ₹  500 के नए नोट फ़िर से बाज़ार में लाने का फ़ैसला किया है. सरकार के इस फ़ैसले से धन कुबेरों द्वारा गैरकानूनी रूप से दबाए गए माल पर असर तो पड़ेगा. मग़र इसका मतलब ये नहीं है कि काले धन का क़ारोबार रुक जाएगा. ये कुछ वक्त की राहत हो सकती है. इस फ़ैसले के साथ ग़रीबी हटाने के नारे से मोदी सरकार ने धूल साफ़ तो की है मग़र देखने वाली बात होगी ग़रीबी को न्यूनतम आवश्यकताओं की चमक कब तक मिल पाती है.

सरकार द्वारा इसको सार्थक बनाने के लिए ₹ 5 हजार से जायदा के लेन देन को ई पेमेंट के माध्यम से करवाना चाहिए अभी सरकार के पास अच्छा अवसर है की जो लोग हार्ड केस जमा कर रहे हैं उनको सिर्फ ई बैलेंस देना चाहिए जिससे उनको आज से ही आदत बन जाये और बीमार अर्थव्यवस्था का स्थाई इलाज हो सके. और यह करना बड़ा आसान है क्योंकि सरकार के पास आज 90 % लोगों के आधार कार्ड हैं उनसे उनकी बैंकिंग को लिंक कर देना चाहिए जिससे सभी लेन देन का सरकारी व्यौरा आने लगेगा और कालाधन ख़त्म हो जायेगा.

(कृषि विज्ञान में मास्टर्स और कृषि अर्थशास्त्र एवं कृषि प्रबंधन में एमबीए करने के बाद लेखक केदार सिरोही ने और 2 वर्ष तक विदेश में काम किया। फिलहाल किसानों के गैर-राजनैतिक संगठन आम किसान यूनियन में कोर कमिटी के सदस्य हैं। यहाँ व्यक्त विचार निजी हैं, इनका ‘चौपाल’ से कोई संबंध नहीं है)[sgmb id=”1″]

 

1 Comment


  1. // Reply

    Mai aapke vicharo se sahamat hu kaidaar saroha ji

    Thanku

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

+ 58 = 62