कृषि पर कर से किसानों की आय हो सकती है दोगुनी

–केदार सिरोही  (@KedarSirohi)

“कार्पोरेट के किसान खेती से होने वाली आय की आड़ में कालेधन की फसल को सफ़ेद धन की उपज बना रहे हैं।”
“आयकर 1961 के सेक्शन 10 (1) में कृषि आय को छूट दी गई है जिसके कारण कुछ लोग 10 नंबर की आय को 1 नंबर में कर रहे है”

देश में कई दशक से आमजन में चर्चा है की किसानों पर आयकर नहीं लगाने से अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं हो पा रही है वहीं दूसरी तरफ देश farmerकी सरकार किसानों की आय को दुगना करने के दावे भी कर रही है, जो किसान ,जनता और नीति निर्धारक इस विषय पर भ्रम की अवस्था पैदा कर रहे हैं. भारत जैसे कृषि प्रधान देश में तो यह चिंता और भी ज्यादा गंभीर हो जाती है कि इतना गंभीर मसला होने के बावजूद इस बारे में केंद्र की किसी भी सरकार के दृष्टिकोण में कोई अंतर नहीं आया जो कि चिंता का विषय है. इस समस्या को समझने में जितनी देरी की जा रही है, यह उतनी ही ज्यादा गंभीर होती जा रही है. आखिर यह कैसी व्यवस्था है, क्या इससे कृषि और किसानों का भला हो पाएगा? इस बारे में गंभीरता से विचार करने की जरूरत है क्योंकि  हमारे यहां किसानों की संख्या में भी अभूतपूर्व कमी आयी है, जबकि सामान्य जनसंख्या में बढोतरी हो रही है. जनगणना, 2001 के अनुसार जहां वे 127 लाख थे, वहीं जनगणना 2011 में ये घट कर 118.7 लाख रह गये हैं.दूसरी तरफ विकास के नाम पर उपजाऊ जमीनों का अधिग्रहण होने से वो भी कम हो रही है.

आज देश में किसानों के नाम पर कई प्रकार की सब्सिडी है जिसमें खाद, बीज, बिजली और ब्याज आदि मिल रहा है और फसलों के भाव डिमांड-सप्लाई ,बाजार ,महंगाई, राष्ट्रीय – अंतर्राष्ट्रीय भाव ,मुद्रा की स्तिथि,मानसून,पुराना स्टॉक और राजनातिक स्तिथयों पर निर्भर कर रहे हैं जबकि हम सब जानते हैं की हमारी स्तिथि विश्व के 5 प्रमुख कृषि उत्पादक में से है एक साधारण समझ है कि यदि कोई देश हमको हमारे मूल्य से कम भाव पर कोई फसल भेज रहा है तो स्वाभाविक है उनके बाजार में हमारे यहां से कम भाव हैं इसलिए हमारे बाजार में वो बिकने आ रहा है परन्तु फिर भी उनके किसानों की आय सामान्य व्यक्ति से 200% ज्यादा हो इसका सीधा मतलब है की वह सरकार किसानों को सुनिश्चित आय और सब्सिडी दे रही है जबकि हमारे देश में कर्ज सुनिश्चित किया जा रहा है जबकि आय की सुनिश्चिता आजतक किसी ने नहीं दी है.

देश में 12 करोड़ किसान हैं जिसमें 10 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन रखने वाले मात्र 4% (48 लाख) किसान है जिनमें 4 लाख किसान आयकर द्वारा हजारों करोड़ की छूट ले रहे हैं जो कि मात्र कुल किसान आबादी का 0.33 % है, यह 4 लाख किसान जो व्यापारी,CA,बड़े अधिकारी,नेता है जिनकी बंजर जमीनें सोना उगल रही हैं और दूसरी तरफ 80% किसान 2 हेक्टेयर से कम जमीन रखे है. जिसके कारण आज देश में हर घंटे 2 गरीब किसान आत्महत्या कर रहे हैं वहीं एक कार्पोरेट किसान हैं जो 200 करोड़ की आयकर छूट से फायदा कमा रहा है जो विचार करने योग्य है इसलिए आज देश में किसानों की आय पर आयकर लगाना जरुरी हो गया इसके लिए हमें एक सशक्त नीति का निर्धारण करना होगा.

समय की नजाकत को देखते हुए सरकार द्वारा सीलिंग एक्ट से ज्यादा या 30 एकड़ से ज्यादा जमीन रखने वाले और जो  किसान 30 लाख से ज्यादा का इनकम टैक्स से फायदा ले रहे हैं उन पर टैक्स लगाना चाहिए जबकि बाकि किसानों को दूर रखना चाहिए क्योंकि कृषि बहुत बड़ा जुआ है जिसमें हर वर्ष आय में बहुत बडा फेर बदल मिलेगा जिस कारण सरकार व्यवस्थित कर प्रणाली नहीं बना सकेगी जिससे छोटे किसानों से आय कर को लेने के लिए आयकर से ज्यादा खर्च सरकार को वसूलने के लिए करना पड़ेगा क्योंकि आजमात्र 4% लोग आयकर दे रहे हैं. उनको आयकर द्वारा नहीं पकड़ा जा रहा है जिससे देश में आज 400 लाख से ज्यादा का कालाधन खड़ा हो गया है और एक सहायक अर्थव्यवस्था का रूप ले लिया है. इसलिए यह व्यवस्था कम खर्च में प्रभावशाली रहे देश में बड़े किसान जिनकी संख्या  4 से 6 लाख हो सकती है. उनको दायरे में लाकर आयकर लगाया जा सकता है सर्व ज्ञात है कि खेती की कमाई पर इनकम टैक्स नहीं लगता है लिहाजा खेती से कमाई दिखाने वालों की संख्या अचानक बढ़ गई है. 2004 में सिर्फ 1 व्यक्ति ने खेती से कमाई दिखाई और 2008 में 2 लाख से ज्यादा लोगों ने खेती से कमाई दिखाई थी.  2008 में खेती से कमाई के तौर पर 17,116 करोड़ रुपये का खुलासा हुआ था और 2011 में रकम बढ़कर 2000 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई है यानी जीडीपी के करीब 20 गुना के बराबर खेती से कमाई का खुलासा हुआ है. इसी कारण सीबीडीटी ने खेती से कमाई दिखाने वालों की जांच के आदेश दिए हैं और 1 करोड़ से ज्यादा कमाई दिखाने वालों की जांच की जाएगी. आकड़ों से यह बात सामने आई है कि पिछले नौ निर्धारण 2006-07 से 2014-15 वर्षो में कुल 2,746 लोगों ने एक करोड़ रुपये से ज्यादा की कृषि आय घोषित की है, जबकि साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि तीन निर्धारण वर्ष 2011-12 से 2013-14 की जांच की जाना बाकि है. प्रश्नचिन्ह यह है की करोड़ों रुपए की कृषि आय दर्शाने वाले लोगों की घोषणा को इनकम टैक्स विभाग ने बिना किसी जांच के ही स्वीकार कर लिया. अधिकारियों ने यह जानने का प्रयास नहीं किया कि वास्तव में कृषि से यह आय संभव है भी या नहीं.

taxसभी लोग जानते है की कुल जीडीपी कृषि की भागीदारी लगभग 14% है जिसमें पशुधन और वन भी सम्मलित है. इस वर्ष के अनुसार 1.5 लाख करोड़ की कृषि उपज होगी जो की आज तक की सबसे ज्यादा होगी परन्तु देश में जीडीपी के गलत मापदंड के कारण वास्तविक आय का आकलन नहीं हो पा रहा है ,या दूसरा कारण यह भी हो सकता है की आर्थिक मामलों के जानकारों का मानना है कि जैसे जैसे देश की कृषि की भागीदारी कुल जीडीपी में कम होती तो उसको विकास माना जाता है इसलिए विकसित देश में कृषि की भागीदारी लगभग 5 से 7% तक और 3-5 % जनसंख्या कृषि पर आश्रित है, विकसित देशों की तर्ज पर हमारे  देश की कृषि को कागज पर विकास में लाने के लिए सरकार 7 करोड़ किसानों को खेती से हटाना चाहती है मतलब साफ है कि सरकार कार्पोरेट फार्मिंग लाना चाहती है जो की भारत की सेहद के लिए ठीक नहीं होगा जबकि हमारे देश में किसानों को हटाने और कर्ज की जगह किसानों को इनकम और इन्वेस्टमेंट की जरुरत है क्योंकि आज भी देश में 35 % कृषि सिंचित है और 60 % किसान अपने माल को मंडी में बेच ही नहीं पा रहे है,जबकि कृषि मुख्य रोजगार का साधन है जिससे 60% लोगों को रोजगार मिला हुआ है और अगर हम उसी रोजगार के उत्पादन की फैक्ट्री को बंद करके दुसरे सेक्टर में जाते है तो एक कुशल श्रमिक को अकुशल श्रमिक बना रहे हैं,जबकि हर सेक्टर में एक एक्सपर्ट की खोज को प्राथमिकता दी जा रही और यह सब दोषपूर्ण नीति निर्धारण का निर्णय और विश्व बाजार की नकल करने के कारण हो रहा है| जबकि हमें जीडीपी में खेती का शेयर बढ़ाना होगा उसी के अनुसार सरकार को खेती के विकास में खर्च करना होगा क्योकि कृषि की बड़ी आय का कोई लेखा जोखा नहीं होता क्योकि किसान के उत्पादन और बाजार में बेचने में बहुत बड़ा अंतर है क्योकि स्वयं और मजदूरों को आज भी केश की जगह अनाज दिया जाता है जिसका कोई लेखा जोखा जीडीपी में नहीं तो आप मान सकते हैं कि देश की 70% जनसंख्या का भोजन ,सब्जी ,दूध ,घी ,अन्डों का जीडीपी में गणना नहीं है इसलिए कृषि की बड़ी भागीदारी होते हुये बहुत छोटी नजर आती है|

देश की कृषि हमेशा से सौतले व्यवहार और विकास के माडल की भेंट चढ़ती रही है उसका कारण यह की देश में उत्पादन और मूल्य बढ़ने के साथ साथ कृषि की जीडीपी में भागीदारी घटती रही जिसके परिणाम स्वरुप सरकारी और प्राइवेट दोनों इन्वेस्टमेंट कम रहे है.आज तक जीडीपी का 1.5 से 2% तक ही इन्वेस्टमेंट हुआ है जबकि योगदान 15 % से हमेशा अधिक रहा है  अगर देश में कृषि में बड़ा इन्वेस्टमेंट होता है तो प्रोडक्शन बढ़ेगा रूरल इंडस्ट्रीज बढेंगी एक्सपोर्ट बढ़ेगा पलायन रुकेगा बेरोजगारी रुकेगी किसान आत्महत्या रुकेगी आज खेती में बडा निवेश क्रेडिट ,सिचाई , मौसम ,रिसर्च डेवलपमेंट उन्नत बीज ,मार्केटिंग ,प्रोसेसिंग , भण्डारण ,हेल्थ एजुकेशन में करने की जरुरत है. आज जिनको लगता है की कृषि में इन्वेस्टमेंट करने से विकास में तेजी नहीं आएगी वह वास्तव में भारत की कृषि ताकत को समझ नहीं पा रहे है हमारे सामने चीन ,जापान और इसराइल जैसे देशों का उदाहरण जो अपनी अर्थव्यवस्था को कृषि की ताकत से खड़ा रखे हैं जबकि उन देशों तुलना में भारत में प्रति हेक्टेयर निवेश नगण्य ही है.

इन सबके मध्य सवाल यह खड़ा है की एक तरफ 4 लाख किसानों द्वारा करोड़ों की आय सुनिश्चित हो रही  वहीं दूसरी तरफ 4 लाख किसानों ने आजतक आत्मत्या कर ली है, लगभग 8 करोड़ किसानो पर 7 से 8 लाख करोड़ का कर्ज है और घाटे के कारण 40% किसान आज कृषि को छोड़ना चाह रहे हैं. इनमें इनकम टैक्स देने वाले ऐसे किसानों की संख्या बेहद कम है, देश में 80 प्रतिशत से अधिक छोटे किसान हैं,पिछले दस सालों में भारत की कृषि ग्रोथ 5 फीसद से ऊपर नहीं निकल पाई है. आलम यह रहा है कि कृषि लागत भी नहीं निकल पाने की वजह बड़ी संख्या में किसान गरीबी का दंश झेल रहे हैं. मतलब साफ है कि जो 0.33% करदाता किसान है उनकी संख्या कर्ज पति किसान से बहुत कम है इसका मतलब की यह लोग किसानो की आड़ में किसानो की सुविधाओं का उपयोग अपने व्यापर को बढ़ाने में कर रहे है. बड़ा आश्चर्यचकित करने वाला है की 2 हजार लाख करोड़ रुपये यानी भारत की जीडीपी से 20 गुना ज्यादा ये सुनने में तो मजाक ही लगता है, लेकिन ये मजाक क्या भारत के करदाता के साथ किया जा रहा है? एक तरफ सूखे से प्रभावित किसानों की हालत खराब है आत्महत्या के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. दूसरी तरफ धनी किसान हैं, जो टैक्स नही देते हैं. मतलब यह कार्पोरेट के किसान खेती से होने वाली आय की आड़ में कालेधन की फसल को सफ़ेद धन की उपज बना रहे हैं. यह मामला कितना बड़ा हो सकता है, इसका अंदाजा एक आम आदमी तो लगा ही नहीं सकता.

एक तरफ तो सरकार किसानों से खेती के विविधीकरण की ओर रुख करने की सलाह दे रही है दूसरी ओर 100 फसलो में कुल 22 जिंसों की farmer1एमएसपी दी जा रही है उसमे सरकारी स्तर पर सिर्फ गेहूं और धान की एमएसपी पर ही खरीद सुनिश्चित की जाती है. सरकार को आज किसानो की आय दुगनी करने की चिंता है वही बढती किसान आत्मत्या है यही कारण है कि प्याज, लहसुन, टमाटर आलू और दलहन की बंपर फसल होने पर बाजार में इनका कोई खरीदार नहीं मिलता. इस तरह की नीतियों से कृषि के समग्र विकास की कतई उम्मीद नहीं की जा सकती जबकि मलयेशिया, थाईलैंड जैसे देश कृषि के विकास के जरिए आगे बढ़ रहे हैं. मौजूदा केंद्र सरकार की बात करें तो यह वर्ष 2022 तक किसानों की आय बढ़ाकर दोगुना करने का दावा कर रही है. इसकी तह में जाकर देखें तो यह सिर्फ कागजी नारा है. इस दिशा में अभी तक ऐसा कोई खाका तैयार नहीं किया गया है, जिससे किसानों की आय में इजाफा होगा ,फसल बीमा योजना और ई मंडी की व्यवस्था सिर्फ कागजों में ही अच्छी दिख सकती है.सर्वविदित है कि कृषि में निवेश से सबसे ज्यादा रोजगारों का सृजन होता है फिर भी इस ओर गौर नहीं किया जात यदि सरकार कृषि क्षेत्र का वाकई विकास करना चाहती है तो अब समय है की कृषि में निवेश को बढावा देवे और कृषि आय कर में संसोधन करे और सरकार विकास के लिय जीडीपी में कृषि की भागीदारी को बढाना पर बल देवें.

देश में कैसे कृषि आय दुगनी हो सकती है क्योंकि 1 से 1.5 लाख करोड़ की कृषि उत्पादन है और हम 68 हजार करोड़ की कार्पोरेट इंसेंटिव दे रहे, 10 हजार करोड़ की कृषि आयकर में छुट प्रदान जा रही है, लगभग 60 हजार करोड़ अन्य कृषि की छुट और वायदा बाजार कम टैक्स माध्यम से दे रहे है साथ ही सरकार द्वारा कॉर्पोरेट सहायता,स्पेशल इकनोमिक जोन ,कोस्टल इकनोमिक जोन आदि की राहत ख़त्म कर देना चाहिए और इन सब छुट का योग देश की कृषि की आय से जायदा है,जो की 1.5 लाख करोड़ से ज्यादा है, इसका उपयोग किसानो को देना चाहिए इस प्रकार किसानो की आय दुगनी हो जाएगी जिसके कारण अगले 10 साल में बेहद संतोषजनक परिणाम आयेंगे, क्योंकि यदि कृषि की आय बढेगी तो आने वाले समय में किसानो के पास सेविंग बढ़ेगी जिसका उपयोग किसान द्वारा कृषि के सहायक व्यापर जैसे मुर्गी ,मछली ,बकरी ,दूध रेशम, मधुमखी पालन जैसे व्यापार शुरू करने में होगा जिसके परिणाम स्वरुप ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और गांव में सम्पनता आएगी और जैसे जैसे सम्पनता आएगी किसान लघु उद्योग करेंगे ,प्रोसेसिंग करेंगे ,व्यापर करेंगे ,इन्वेस्टमेंट करेंगे ,जिसके कारण गांव खेती के साथ साथ एक फैक्ट्री बनकर सामने आयेगा जो देश की कंपनियों से जायदा टैक्स देगा बाकि आज देश में कंपनियों की हालत जानते है की बर्ष  2014-15, देश की  43.6% नुकसान में रही वही , 3% कंपनियो ने कोई भी लाभ नहीं कमाया और  47.4%  ने अपना प्रॉफिट 1 करोड़ तक दर्शाया है जबकि 6 % कंपनिया 1 करोड़ से जायदा का शुध लाभ दिखा रही हैं और सन 2014-15 में देश में लाभान्वित 52,911 भारतीय कंपनिया 0% टैक्स दे रहीं हैं वैसी स्थिति में 0.33% किसानों की आय करोड़ों में आना बेहद मजाकिया लगता है.

(कृषि विज्ञान में मास्टर्स और कृषि अर्थशास्त्र एवं कृषि प्रबंधन में एमबीए करने के बाद लेखक केदार सिरोही ने और 2 वर्ष तक विदेश में काम किया। फिलहाल किसानों के गैर-राजनैतिक संगठन आम किसान यूनियन में कोर कमिटी के सदस्य हैं। यहाँ व्यक्त विचार निजी हैं, इनका ‘चौपाल’ से कोई संबंध नहीं है)

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1 Comment


  1. // Reply

    शानदार सोच।। जय किसान

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