ईवीएम में छेड़छाड़ क्यों संभव नहीं?

वर्ष 2017 के फरवरी-मार्च महीने में संपन्न पांच राज्यों के विधानसभाओं के चुनाव परिणामों के बाद, कई अंसतुष्ट राजनैतिक दलों ने ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी कर चुनाव परिणामों को प्रभावित करने की बात उठायी थी। उत्तरप्रदेश के निकाय चुनावों के मद्देनज़र यह चर्चा फिर से जोरों पर चल पड़ी है। आलोचना करने वाले अपने (कु)तर्कों में इतने मगन हैं कि वे भूल जाते हैं कि इन स्थानीय चुनावों में ईवीएम के साथ-साथ बैलेट पेपर से भी चुनाव होते हैं। एक बार फिर से, तकनीकी एंव प्रशासनिक आधार पर देखा जाये तो यह न केवल आधारहीन गलतबयानी है बल्कि चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता एंव पारदर्शिता के प्रति आम मतदाताओं में भ्रम की स्थिति पैदा करने जैसा है। ईवीएम टैंपरिंग की सभांवना के पीछे कई लोग जीवीएल नरसिम्हा राव की ईवीएम टैंपरिंग पर लिखी किताब ”डेमोक्रेसी एट रिस्क” में उल्लेखित बिदुंओं को अपना आधार बना रहे है। साथ ही कुछ लोग साल 2010 में बीबीसी द्वारा साझा की गयी उस वीडियों को भी दिखा रहे हैं, जिसमें वोटिंग मशीन में गड़बड़ी कर, रिज़ल्ट को बदल देने का दावा मिशीगन विश्वविधालय के शोधकर्ता जे. एलेक्स हल्डेरमैन द्वारा किया गया है। सोशल मीडिया में तेजी से वायरल हो रही ईवीएम में गड़बड़ी की भ्रामक सूचनाओं को देखते हुए भारतीय निर्वाचन आयोग 11 एंव 16 मार्च 2017 को ही अपना आधिकारिक वक्तव्य जारी करते हुए ईवीएम के कार्यकरण को स्पष्ट किया था। निर्वाचन आयोग ने इस वक्तव्य में स्पष्ट किया है कि ईवीएम पूरी तरह से टैंपर प्रूफ है। इतना ही नहीं, बाद में तो आयोग ने ईवीएम को हैक करने के लिए बाकायदा लोगों को आमंत्रित भी किया लेकिन तब किसी दल ने या व्यक्ति ने इतना साहस नहीं दिखा पाया कि सोशल मीडिया पर वे जो लिख रहे हैं, फॉरवर्ड कर रहे हैं, उसे सिद्ध करके दिखाएं। उन्होंने ऐसा नहीं किया।

अब फिर से किताब की ओर लौटते हैं। जीवीएल नरसिम्हा राव अपनी किताब में ईवीएम में सॉफटवेयर एंव हार्डवेयर की गड़बड़ी की बात करते है लेकिन इसके कोई मजबूत आधार प्रस्तुत नहीं कर पाते है…. सबसे पहले इस बात को समझ लेना चाहिए कि भारत में चुनावों में निष्पक्षता एंव पारदर्शिता का आधार न केवल ईवीएम मशीनों का प्रयोग है बल्कि चुनावी प्रक्रिया के हर स्तर पर होने वाला ईवीएम का मानवीय पर्यवेक्षण एंव प्रक्रियात्मक चेक-बैलेंस भी है, जो निर्वाचन आयोग द्वारा नियुक्त विभिन्न अधिकारियों एंव तकनीकी कर्मियों द्वारा, विभिन्न चरणों में किया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि मशीनी स्तर पर कोई कमी आ रही हो, तो वह त्वरित तौर पर पकड़ में आ जाये। ईवीएम की आलोचना करने वालों ने अपनी बात कहने में पूरा जोर केवल मशीन में टैंपरिंग करने पर परिणाम के प्रभावित होने पर लगाया है, ईवीएम के प्रक्रियात्मक चेक-बैलेंस एंव मानवीय पर्यवेक्षण पर उन्होंने कोई अध्ययन नहीं किया है। जैसे- ईवीएम में खराबी की जांच हेतु फर्स्ट लेवल चेंकिग, बूथवार ईवीएम आवंटन के लिए रैंडमाइजेशन की प्रक्रिया, वोटिंग एंव रिजल्ट की जांच के लिए मॉक पोल (वास्तिविक मतदान से पहले परीक्षण के लिए किया जाने वाला मतदान), विभिन्न चरणों में ईवीएम की होने वाली सीरियल नंबर आधारित सीलिंग, वोटिंग वाले दिन पीठासीन पदाधिकारी द्वारा मतदान करने वाले मतदाताओं का रजिस्टर-;17ए का निर्माण, मतदान की समाप्ति के बाद ईवीएम में किये गये मतदान का अकांउट ऑफ वोट रजिस्टर-;17सी को तैयार किया जाना एंव इसे पारदर्शिता हेतु सभी उम्मीदवारों के पोलिंग एजेंटों को उपलब्ध कराया जाना। गौर करने लायक बात है कि रजिस्टर 17ए और 17सी के आधार पर ही काउंटिग वाले दिन ईवीएम से काउंट रिजल्ट का मिलान किया जाता है एंव परिणाम को तैयार किया जाता है। इस स्तर पर रिज़ल्ट का क्रास वैरीफिकेशन भी होता रहता है। इस सबके बाद भी चुनाव ऑब्जर्वर और रिर्टनिंग आफिसर द्वारा उम्मीदवारों के समक्ष स्क्रूटिनी कि जाती है ताकि उम्मीदवारों की तरफ से यदि कोई समस्या या शंका हो तो उसका समाधान कर दिया जाय। इस तरह से देखा जाये तो पूरे चुनाव प्रक्रिया में विभिन्न प्रक्रियात्मक चेक-बैलेंस एंव मानवीय पर्यवेक्षण के स्तर रखे गये है, ताकि पूर्ण पारदर्शीता एंव निष्पक्षता प्रभावित न हो। ऐसे में चुनावी प्रक्रिया में प्रक्रियात्मक चेक बैंलेस एंव मानवीय पर्यवेक्षण को समझे बिना ईवीएम टैंपरिंग के तर्क केवल आधारहीन बातें रह जाती हैं।
नरसिम्हा साहब ने अपनी किताब में बताया है कि ईवीएम मशीन से इस बात का पता नहीं चलता है कि मतदाता का वोट किस उम्मीदवार के पक्ष में गया है। इस समस्या का समाधान भी ईवीएम मशीनों में वीवीपीएटी यूनिट लगाकर किया जा रहा है। वैसे तो परम्परागत तौर पर ईवीएम मशीन में दो यूनिट होती है, बैलट यूनिट और कंट्रोल यूनिट। ये तीसरी वीवीपीएटी यूनिट मतदाता को 7 सेंकड के लिए एक पर्ची दिखाती है जिसमें इस बात का उल्लेख रहता है कि मतदाता ने अपना मत उम्मीदवार के पक्ष में डाला है। बहुत जल्द निर्वाचन आयोग की योजना वीवीपीएटी के लिए वांछित बजटीय प्रावधानों के पूरे होते ही इसका प्रयोग सभी विधानसभा व लोकसभा सीटों के चुनावों पर करने की है। वर्तमान में चुनाव आयोग इसका प्रयोग वीवीपीएटी यूनिट की उपलब्धता के आधार पर चयनित सीटों पर करता/कर रहा है।

“भारत में प्रयोग हो रहे ईवीएम में ऑनलाइन कनेक्शन नहीं होता है, इसलिए इसमें इंटरनेट के जरिये टैंपर करना भी नामुमकिन है। इन मशीनों में वनटाइम प्रयोग होने वाला प्रोग्राम्ड मास्कड हार्डवेयर प्रयोग हो रहा है, जिससे छेड़छाड़ होने पर वह काम करना बंद कर देता है।”

नरसिम्हा साहब के साथ-साथ तमाम लोगों का एक सवाल यह भी है पश्चिमी दुनिया के कई देशों ने ईवीएम को अपने यहां बंद कर रखा है, फिर भारत में ऐसा क्यों है? इसके कई कारण है, वहां कई देश ऑनलाइन नेटवर्क वाले ईवीएम प्रयोग कर रहे है, जिन्हें इंटरनेट के जरिये टैंपर करना संभावित है। यूरोप में कई देशों की जनसंख्या बहुत कम है, ऐसे में वे ईवीएम की जगह बैलेट पेपर का प्रयोग ज्यादा सस्ता एंव आसान मानते है। कई देशों में निर्वाचन की आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली अपनायी जाती है, जहां उम्मीदवारों को वरीयता क्रम में वोटिंग होती है, इसके लिए बैलट पेपर वोटिंग आसान होती है। इसका उदाहरण भारत में विधान परिषद सदस्यों के चुनाव के लिए होने वाली वोटिंग है, जहां बैलेट पेपर का प्रयोग किया जाता है। लेकिन इस तरह की वोटिंग अत्यंत थकाऊ, जटिल होती है एंव संसाधनों का भारी व्यय करना पड़ता है। भारत जैसे बड़ी जनसंख्या वाले देशों में बैलट पेपर की तुलना में ईवीएम का प्रयोग ज्यादा सस्ता, सुलभ, त्वरित एंव पारदर्शी चुनावी मैकेनिज़्म उपलब्ध कराता है। भारत में प्रयोग हो रहे ईवीएम में ऑनलाइन कनेक्शन नहीं होता है, इसलिए इसमें इंटरनेट के जरिये टैंपर करना भी नामुमकिन है। इन मशीनों में वनटाइम प्रयोग होने वाला प्रोग्राम्ड मास्कड हार्डवेयर प्रयोग हो रहा है, जिससे छेड़छाड़ होने पर वह काम करना बंद कर देता है।

एक बात और ध्यान देने लायक है कि मतदान के दिन पीठासीन अधिकारी द्वारा कंट्रोल यूनिट से बैलट दिये जाने के लिए बटन दबाये जाने पर ही गोपनीय कक्ष में वायर के द्वारा जुड़ी हुई बैलेट यूनिट में मतदाता बटन दबा कर अपना मत गिरा सकता है। किसी अन्य इलेक्ट्रानिक गैज़ेट द्वारा भेजे गये संकेतों को बैलट यूनिट ग्रहण नहीं करती। निर्वाचन आयोग पहले ही इस बात को सामने ला चुका है कि सोशल मीडिया में जिस ईवीएम में टैंपरिग का वीडियों दिखाया जा रहा है, वह प्राइवेट स्तर पर बनायी गयी ईवीएम है न कि भारतीय निर्वाचन आयोग की ईवीएम।

नरसिम्हा साहब की किताब में ईवीएम में ट्रोज़न वायरस इंनफेक्टेड या कोडेड माइक्रोंचिप लगा कर टैंपरिग की बात भी केवल एक दिमागी कल्पना के अलावा और कुछ नहीं है। ऑनलाइन कनेक्शन न होने से मशीन में वायरस प्रसारित नहीं किया जा सकता है। दूसरी बात ईवीएम का निर्माण भारत इलेक्ट्रानिक्स लिमिटेड, (बीईएल) और इलेक्ट्रानिक्स कार्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ईसीआईएल) जैसे लोक उपक्रम बेहद गोपनीय मानकों के तहत को पूरा करते है। ऐसे में किसी बाहरी स्त्रोत द्वारा माइक्रोचिप लगा देना संभव नहीं है। उस पर भी हमें ध्यान देना होगा कि प्रत्येक लोकसभा एंव विधानसभा के आम चुनावों में लाखों ईवीएम का प्रयोग होता है, ऐसे में जब सभी ईवीएम को कई चरणों के मानवीय पर्यवेक्षण एंव प्रक्रियात्मक चेक-बैंलेस से गुजरना होता है। सभी ईवीएम में माइक्रोचिप प्लांट कर रिज़ल्ट को बदल देने वाली बात केवल फिल्मी फैंटेसी सी लगती है।

“यह समझना होगा कि निर्वाचन की प्रक्रिया एक मैराथन टीम वर्क है, जिसमें लाखों निर्वाचन कर्मी शामिल होते है। ये निर्वाचन कर्मी स्वंय एक विषमांगी समूह बनाते है, विभिन्न सामाजिक समूहों व धार्मिक संप्रदायों से आते है। निर्वाचन कर्मी स्वंय में मतदाता भी हैं, जिनके राजनैतिक रुझान भी अलग है। ऐसे में ये कतई संभव नहीं है कि आंतरिक मशीनरी का कोई हिस्सा किसी एक राजनैतिक उम्मीदवार के पक्ष में अत्यंत गोपनीय तरीके से लाखों ईवीएम में लाखों निर्वाचन कर्मियों से आंख बचाते हुए टैंपरिंग कर ले जाए”

नरसिम्हा साहब अपनी किताब में इस बात की शंका भी उठाते है कि ईवीएम टैंपरिंग में आंतरिक मशीनरी शमिल हो सकती है, इस बात पर भी यह समझना होगा कि निर्वाचन की प्रक्रिया एक मैराथन टीम वर्क है, जिसमें लाखों निर्वाचन कर्मी शामिल होते है। ये निर्वाचन कर्मी स्वंय एक विषमांगी समूह बनाते है, विभिन्न सामाजिक समूहों व धार्मिक संप्रदायों से आते है। निर्वाचन कर्मी स्वंय में मतदाता भी हैं, जिनके राजनैतिक रुझान भी अलग है। ऐसे में ये कतई संभव नहीं है कि आंतरिक मशीनरी का कोई हिस्सा किसी एक राजनैतिक उम्मीदवार के पक्ष में अत्यंत गोपनीय तरीके से लाखों ईवीएम में लाखों निर्वाचन कर्मियों से आंख बचाते हुए टैंपरिंग कर ले जाए।

नरसिम्हा साहब ने स्टोरेज़ एंव काउंटिंग प्रक्रिया पर भी अपनी किताब में सवाल उठाये हैं। काउंटिग के बारे में उनका यह तर्क कि भारत निर्वाचन आयोग मतदान के पहले तीन महीने तक निर्वाचन प्रक्रिया को चलाते हैं, लेकिन काउंटिग एक ही दिन में पूर्ण कर देता है। लेकिन ईवीएम मशीन का ईजाद ही इसलिए किये गया था कि जटिल निर्वाचन प्रक्रिया को सरल तरीके से संपादित कर निष्पक्ष एंव पारदर्शी तरीके से त्वरित परिणामों की प्राप्ति की जा सके। केवल सप्ताह भर या दस दिन तक काउंटिग प्रक्रिया के चलते रहने को ईवीएम की प्रमाणिकता मानना, केवल एक अव्यावाहरिक तरीका है, जो काउंटिग के उसी परंम्परागत बैलट की गिनती वाले ढांचे को सपोर्ट करता है, जिसे चुनाव आयोग तकनीकी विकास के साथ बहुत पीछे छोड़ आया है। यह केवल एक पुरातनपंथी अप्रोच के अलावा और कुछ नहीं है। मतदान के बाद ईवीएम की सुरक्षा हेतु मतदान के बाद त्रि-स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था का प्रावधान होता है। स्वयं उम्मीदवार ईवीएम की सीलिंग करते हैं और उसके स्ट्रांग रुम पर जाकर सुरक्षा व्यवस्था की जांच कर सकते हैं। ध्यान देने लायक बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट एवं देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में ईवीएम टैंपरिंग से संबंधित जितने भी मामले अभी तक आये हैं, उनमें से किसी भी मामले में ईवीएम में टैंपरिंग सिद्ध नहीं हो पायी है। स्वयं निर्वाचन आयोग आम लोगों को आंमत्रित करता है कि वे लोग आयोग जाकर ईवीएम की तकनीक को गलत सिद्द करने हेतु अपने दावे प्रस्तुत करे। लेकिन आज तक कोई भी दावा सही सिद्ध नहीं हुआ है।

साल 2001 में मद्रास हाईकोर्ट ने ईवीएम टैंपरिंग के मामले को निराधार बताया था। कर्नाटक हाईकोर्ट ने 2004 में एक मामले मे ईवीएम को राष्ट्रीय गौरव घोषित किया था। साल 2002 में केरल उच्च न्यायालय व बंबई उच्च न्यायालय ने भी 2005 में अपने एक निर्णय में ईवीएम के कार्यकरण को निष्पक्ष एंव पारदर्शी ठहराया था। इस आधार पर देखे तो चुनाव आयोग का स्पष्ट निदेश है कि ईवीएम चुनाव की एक पारदर्शी, निष्पक्ष, त्वरित, सस्ती, सुलभ एंव तकनीकि तौर पर प्रभावी मैकेनिज्म को उपलब्ध कराती है और यह पूरी तरह से विश्वसनीय मानकों पर खरा उतरती है। इन सभी आधारों को देखे तो जीवीएल नरसिम्हा की किताब उन आधारों को तार्किक तरीके से नहीं रख पाती जिसके आधार पर पारदर्शी, निष्पक्ष, त्वरित, सुलभ निर्वाचन प्रक्रिया के संपादन हेतु ईवीएम के कार्यकरण को प्रश्नगत किया जा सके। इसके अलावा जो भी सोशल मीडिया में चलाया जा रहा है, वह अंततः हमारे निष्पक्ष एवम पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया की साख को कम करने के अलावा और कुछ नहीं कर रहा है। एक जिम्मेदार और सजग नागरिक के तौर पर हमें चाहिए कि हम ऐसी ख़बरों को पढ़ने, उन पर विश्वास करने से पहले, उन्हें आगे बढ़ाने से पहले दस मिनट ठंडे दिमाग से सोचें। आप पाएंगे कि यह महज़ भ्रम है, शेष कुछ नहीं।

(लेखक कपिल शर्मा बिहार राज्य निर्वाचन सेवा के अधिकारी हैं। व्यक्त विचार निजी हैं, चौपाल से कोई संबंध नहीं है)

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