छूटे लोगों को साथ लेने का संकल्प ही राष्ट्र निर्माण है

आज पूरे देश को विश्वास हो रहा है कि हम तरक्की की राह में बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं। यह बात सच भी है कि हमारा देश ज्ञान-विज्ञान तथा तकनीक के मामले में अन्य देशों के साथ प्रतिस्पर्धा में है लेकिन क्या हम सचमुच तरक्की की दौड़ में आगे चल रहे राष्ट्रों की श्रृंखला में हैं? क्या हमें लगने लगा है कि हमारा राष्ट्र एक स्वस्थ्य धावक की तरह अपने सभी अंगों पर नियंत्रण रखकर उनका समुचित लाभ ले रहा है?
मुझे लगता है कि ऐसा सोचने वाले विद्वानों व अर्थशास्त्रियों तथा आंकड़ों के निर्माताओं को एक बार देश व प्रदेश की राजधानियों की हाईटेक व्यवस्था से बाहर निकलकर शहरों की मलिन बस्तियों तथा गाँवों का दौरा जरूर करना चाहिए। असलियत यह है कि एक अरसे से अधिक पहले के आंकड़ों को ही उलट-पलट कर आत्मतुष्टि की जा रही है कि हम दिन-ब-दिन आगे बढ़ रहे हैं। अगर वास्तव में ऐसा होता तो संयुक्त राष्ट्र संघ के मानव विकास सूचकांक में पिछले तथा इस बार के अध्ययनों में भारत की स्थिति 131 वें स्थान पर ही न बनी रहती।


किसी भी राष्ट्र की तरक्की का तर्कसंगत आधार मानव विकास का स्तर ही है। मानव विकास की सूचक आवश्यकताओं में स्वास्थ्य, शिक्षा, चिकित्सा तथा स्वच्छता जैसी मूलभूत आवश्यकताएं हैं। इन सुविधाओं से वंचित समाज में घोर निराशा, लाचारी तथा अशिक्षा व्याप्त है। जिसके फलस्वरूप युवा वर्ग भटकाव की स्थिति में है। इन भटकावों के फलस्वरूप समाज में जघन्य अपराधों में वृद्धि हो रही है। आज जब पूरे देश भर के अपराधों के स्वरूपों पर नज़र डालें तो इनमें बर्बरता की मात्रा चरम पर मिलती है। शहरों की मलिन बस्तियों में अगर देखा जाय तो जीवन-स्तर काफी सोचनीय है। शायद भारत की मानव विकास सूचकांक की स्थिति से भी ज्यादा सोचनीय।
देश में बढ़ रहे अपराधों के पीछे एकमात्र कारण- निम्न वर्गों का बुनियादी सुविधाओं से वंचित होना है। इसके चलते देश के प्रशासक इन्हें देश के मानव संसाधन के रुप में इस्तेमाल नहीं कर पा रहे। ठीक इसके विपरीत समाज में अपराधों को बढ़ावा देने वाले ठेकेदार इस आबादी का समुचित उपयोग अपने पक्ष में कर लेते हैं। इसलिए जरूरी है कि इस तबके के लोगों को मुख्यधारा में लाने हेतु शासन तथा प्रशासन को दीर्घकालीन रणनीति बनाई जाए। एक ऐसी योजना बनानी होगी जिसमें शिक्षा तथा उन्हें रोजगार-परक बनाने पर समुचित ध्यान दिया जा सके। जो सरकार की योजनाओं के अनुरूप निष्क्रिय पड़ी आबादी को देश की तरक्की की धारा में शामिल कर सके।


दूसरी तरफ गाँवों की ओर नज़र डालें तो हमें स्थानीय प्रशासन से जुड़े लोगों में घोर निष्क्रियता दिखाई पड़ती है। गाँव में सड़कों की स्थिति काफी बदतर है। ग्राम-पंचायतों में अपने कद से अधिक घोटाले तथा भ्रष्टाचार हो रहे हैं। गाँवों में पिछड़ी-दलित जातियों के तमाम लोग ऐसे हैं जो कि पीढ़ियों से कच्चे मिटटी के मकानों में रह रहे हैं जिसमें जीवन के कई खतरे हैं। ग्रामीण आवास योजना के अंतर्गत मिलने वाली सहायता राशि में ग्राम प्रधानों तथा अधिकारियो के बीच दलाली होती है, जिसका मामूली अंश ही लाभार्थी को मिल पाता है। बाकि दशाओं में तो किसी ग्रामीण को पता भी नहीं चल पाता कि उसे सरकार द्वारा पक्के मकान के लिए राशि आबंटित की गई है और उनके रूपये दलाओं के हाथ में चले जाते हैं। क्या इसे ही हम उभरते भारत का चित्र मानें जहाँ स्थानीय प्रशासन से लेकर बड़े अधिकारियो तक जनता का हक मारा जाता है..?
अब सवाल पैदा होता है कि भारत को जिस-जिस प्रगतिशील धावक के रूप में पेश किया जा रहा है क्या उसके फेफड़े के रूप में माने जाने वाले गाँवों तथा निम्न कामगार शहरी वर्ग का स्वास्थ्य-स्तर ठीक है। अगर ऐसा नही है तो मुश्किल है कि भारत विकास की दिशा में तीव्र गति से दौड़ रहे राष्ट्रों के बीच सम्मानित स्थान बना पायेगा। आज संपूर्ण राष्ट्र को साथ लेकर चलने की जरूरत है। किसी भी वर्ग की उपेक्षा से राष्ट्र की प्रगति बाधित होगी। शिक्षा व सहयोग ही समाज में व्याप्त अपराधों पर सकारात्मक नियंत्रण कायम कर पाएगा। प्रशासन की कठोरता केवल आक्रोश पैदा करती है। भूखे को रोटी और अशिक्षित को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जाए तो इस नकारात्मक आक्रोश को समाज के विकास की दिशा के अनुकूल ढाला जा सकता है।

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