चर्चा के चबूतरे पर आरती देवी

ग्राम धुंकपाड़ा, जनपद गंजाम, राज्य ओडिशा… इन शब्दों को गूगल में डालिए… जो परिणाम आएंगे वो आरती देवी  के इर्द-गिर्द घूमेंगे… तो कौन हैं आरती देवी  जिनके बारे में मीडिया ने शायद उतना नहीं बताया जितना बताना चाहिए… अपने नाम और स्वभाव के अनुरूप चौपाल  पहुँची भारत की सबसे युवा महिला सरपंच के पास, जिनके कार्यों को न सिर्फ भारत में, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति प्रशासन से भी सराहना मिली।
हालांकि हम सीधे उनके गाँव में जाकर ये चर्चा करना चाहते थे लेकिन न चाहते हुए भी अंत में कुछ बदलाव करने पड़े और हम मिले उनसे ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में और विस्तार से चर्चा की… पेश है प्रमुख अंश…
वो क्या कारण थे कि आप बैंक की एक अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर सरपंच का चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गईं
मैंने दस तक की पढ़ाई अपने गाँव में ही की है। और मैं बचपन से ही सोशल वर्क (सामाजिक कार्य) करना चाहती थी… लेकिन दसवीं की पढ़ाई के बाद मैं शहर आ गई… यहाँ उच्च शिक्षा हासिल की और फिर नौकरी। इस सब चलता रहा। बीस साल बाद aarti-deviमैं गाँव वापस आई… इत्तेफाक़ से तभी राज्य सरकार ने पंचायत स्तर पर महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण की घोषणा की… इसी दौर में हमारी ग्राम-पंचायत महिला के लिए आरक्षित कर दी गई। हमारा गाँव राजनीतिक रुप से बहुत सक्रीय गाँव रहा है। यहाँ से कई लोग विधायक, सांसद और मंत्री हुए है। आबादी भी ज्यादा है। उस समय लोगों ने विचार किया कि ऐसी स्थिति में किसे सरपंच बनना/बनाना चाहिए? फिर गाँव के बुजुर्ग लोगों ने मिलकर फैसला किेया कि आरती से बात की जाए… (चूंकि वो जानते थे कि मैं सोशल वर्क में इंट्रेस्टेड रही हूँ और दसवीं में पहले स्थान पर आई थी तो सबको मेरे बारे में पता भी था) तो फिर 6-7 बुजुर्ग लोग मुझसे मिलते आए… इस समय तक मैं बहरामपुर में रह रही थी और बैंक में इंवेस्टमेंट बैंकर के रुप से नौकरी कर रही थी। उन्होंने ही मुझसे कहा कि सरपंच के लिए चुनाव लड़िए… उस समय तो मुझे बहुत हंसी आई कि मैं क्या करूंगी सरपंच बनकर… लेकिन मैंने उन सभी से 10-12 दिन का समय मांगा सोचने के लिए… इस दौरान गाँव से लोगों के आने का सिलसिला जारी रहा। मैं गाँव गई… (चार-साढ़े चार साल पहले… आप समझ सकते हैं कि कैसा डर रहा होगा) फिर लोग मिले… सब मुझसे बड़े थे। मैंने कहा ठीक है… अगर आप ईमानदारी से मेरे साथ काम करेंगे तो मैं आपका साथ देने के लिए तैयार हूँ। लोगों ने सहमती दी और मैंने नौकरी से रिज़ाइन (इस्तीफ़ा) दे दिया… तो यूँ शुरु हुआ ये सफ़र!
 
इस सबके बाद क्या आप निर्विरोध चुनी गईं?
नहीं, लेकिन आसपास की करीब 47 पंचायत में मुझे सबसे ज्यादा वोट मिले।
एक महिला के तौर पर आपको इस भागीदारी में कहीं ये एहसास हुआ कि आप एक महिला है… इसलिए ये नहीं हो सकता?
जब मैं चुनाव लड़ रही थी तो कुछ महिलाएं मेरे साथ गाँव में घूमी लेकिन जब चुन ली गई और ग्राम-सभा की बारी आई तो एक भी महिला नहीं… मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि ये क्या है? फिर मैंने मजिस्ट्रेट को पत्र लिखा… फिर धीरे-2 महिलाएं आने लगीं… और फिर एक दिन ये संख्या बढ़ती हुई दो हज़ार पहुँच गई… ग्राम-सभा की बैठक में दो हज़ार महिलाएं! दरअसल, इस पीछे महिलाओं के बीच गरीबी-अशिक्षा प्रमुख कारण था। तो हमने निर्णय लिया कि 18 साल से ऊपर सभी महिलाओं को पढ़ाया जाए। एक प्रस्ताव पास हुआ और फिर शुरु हुई शिक्षित करने की प्रक्रिया… चूंकि मैंने मैनेजमेंट की भी पढ़ाई की थी तो ये मैनेज करने में मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई। साथ ही मैंने महिलाओं को ग्राम-पंचायत के प्रति जो डर था, उसे निकालने के लिए उन्हें समझाया कि ये सब आपका, आपके बिना कोई भी निर्णय नहीं लिए जा सकते। जब मैंने पैसे का मैनेजमेंट किया तो आज स्थिति है कि सरकार जो धन देती गाँव के विकास के लिए वो पर्याप्त रहता है। हमें किसी एनजीओ की मदद लेने की जरुरत नहीं पड़ी।
 
जब आपने बैंक की नौकरी छोड़कर सरपंच का चुनाव लड़ने का फैसला किया तो मित्रों, खासकर साथ में काम करने वालों, परिवार के लोगों की क्या प्रतिक्रिया थी? क्या उन्होंने आपने निर्णय का समर्थन किया था?
(मुस्कुराते हुए…) नहीं… परिवार और दोस्तों ने कहा मत आओ… इतनी अच्छी नौकरी छोड़ने की कोई जरुरत नहीं। लेकिन मैंने कहा कि नहीं… मुझे कुछ (अलग) करना है! तो फिर धीरे-2 मुझे साथ मिला। एक प्लस प्वॉइंट मेरे साथ ये था कि मेरे माता-पिता ने कभी लड़का-लड़की में अंतर नहीं किया।
 
आपका कार्यकाल (4.5 साल) लगभग पूरा होने को है। आप जब नौकरी छोड़कर आईं तो उस समय आपने जो कल्पना की थी या जो सपने थे कि “अगर मैं चुनी गई तो गाँव ऐसा होगा… वैसा होगा” इन कल्पनाओं/सपनों को कितना हासिल कर पाई हैं आपने कार्यकाल में?
पहली बार में 750 महिलाओं को पढ़ना-लिखना सिखाया। फिर उन्हीं में से वार्ड सदस्यों का चुनाव किया। हमने नारा दिया-टीपा नूहें, दस्तख़त  (अंगूठा नहीं, अब हस्ताक्षर करेंगे)। महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए एक स्वतंत्र महिला ग्राम-सभा बनाई। इसे देखने लिए राज्य सरकार ने करीब 60 सदस्यीय एक दल भेजा। हमने अपनी पंचायत में एक लाख पचास हज़ार पेड़ लगाए जिसके लिए हमें प्रकृति-मित्र का पुरस्कार मिला। इसके साथ मैंने एक अलग काम ये किया कि गर्वमेंन्ट लैण्ड और प्राईवेट लैण्ड को मर्ज (सार्वजनिक भूमि और निजी भूमि को मिला दिया) कर दिया फिर उस पर वृक्षारोपण का कार्य किया। इस मॉडल को फिर राजय सरकार ने भी अपनाया।
तो ये सब तो मैंने किया लेकिन एक काम मैं नहीं कर पाई हूँ। मैंने गाँव में इंडस्ट्री (उद्योग) शुरु करने की सोची थी लेकिन अभी तक ये नहीं हो पाया है। हालांकि रिज़ोल्यूशन पास (प्रस्ताव पारित) कर दिया गया है। समय पूरा हो गया… लेकिन मैं जरुर करूंगी।
 
कहा जाता है कि ग्राम-पंचायत के चुनावों में गाँव में आपके विरोधी स्पष्तः दिखने लगते हैं। वे हर संभव कोशिश करते हैं कि आपकी कहीं न कहीं हार हो, आपके कामों में रोड़ा अटकाया जाए… आपको ये सब सहना पड़ा?
मैंने गाँव में इंटर किया तो रास्ते उखड़े पड़े थे… लोगों की आशाएं थी कि बेटी तुम आई हो अब कुछ होगा… लेकिन ग्राम-सभा में तो कोई आता ही नहीं था। अब सड़क कैसे बने..?
जब मैं अमेरिका गई तो पांच राज्यों में घूमी… जिसमें एक जगह चुना भी हो रहे थे।  मैंने देखा कि वहाँ वोट देने के लिए एक मतदाता को 15-20 मिनट लगते हैं जबकि अपने यहाँ तुरंत (सेकेण्डों में) हो जाता है। लेकिन वहाँ ऑनलाइन वोटिंग भी है, जो अपने यहाँ नहीं… ये सब अपने यहाँ भी होना चाहिए।
 
ओबामा से जब आपकी मुलाक़ात हुई तो उनका संदेश क्या था? आपकी क्या बातचीत हुई?
जी… बराक ओबामा से हमारी मुलाक़ात हुई लेकिन कोई बातचीत नहीं हुई। हम ब्हाइट हाउस (सं.रा. अमेरिका के राष्ट्रपति का आवास) गए… वहाँ चीजों को समझा लेकिन सीधे बात नहीं हुई।
 
भ्रष्टाचार ने हमें लगभग हर तरफ से जकड़ रखा है। ऊपर से नीचे तक… ऐसे में आपको अपने काम का अप्रूवल लेने में कहाँ-२ समस्याएं आईं?
जी… अपनी ग्राम-पंचायत में मैंने पहला मामला पकड़ा पीडीएस (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) में… लोगों को तीन-चार महीने से राशन नहीं मिल रहा था। चूंकि मैं नई थी तो कुछ पता ही नहीं था… फिर मेन्युअल (नियम पुस्तिका) पढ़ी तब समझ आया कि मैं क्या कर सकती हूँ। शक्तियों का उपयोग किया तो पूरा का पूरा राशन मिल गया। एक साथ 4-5 महीनों का रुका हुआ राशन… फिर पेंशन में गड़बड़ी, इंदिरा आवास योजना में… बीच में बिचौलिए हैं। बिना उनके कुछ काम नहीं होता। कंक्रीट का रोड बनना है तो 15-20 परसेंट दिए बिना काम नहीं करते। मैंने ब्लॉक में जाकर इसके खिलाफ़ आवाज़ उठाई। झगड़ा भी हुआ… अब कुछ चीजें सुधरी हैं लेकिन पूरी तरह अब भी नहीं…। एक कोशिश ये भी कि ये कि गाँव में जो भी काम आएं उनसे कौन-2 लाभार्थी हो, इसका निर्णय एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक कमिटी (समिति) करे।
 
ग्राम-पंचायत या तीसरे स्तर में जो चुनाव होते हैं, उनमें भी धनबल-बाहुबल को खूब जोर देखने को मिलता है। आपका कोई अनुभव इससे संबंधित?
चूंकि मुझे तो लोगों ने बुलाकर निर्वाचित किया तो ये सब मेरे मामले में तो होने का सवाल ही नहीं होता। लेकिन हाँ… मैंने एम एल ए (राज्य विधानसभा) के चुनावों में खूब देखा है। इस सब में मैंने तीन तरह के लोग देखे हैं… एक वे जो प्रत्याशी देखकर वोट देते हैं, दूसरे वे जो पैसों के लालच में वोट देते हैं और तीसरे वे जो बेचारे डर कर वोट करते हैं। दारु भी पिलाई जाती है।
 
जिन लोगों ने आपको निर्वाचित किया/कराया क्या वे आपके काम से खुश हैं? उनकी आकांक्षाएं कितनी पूरी हुईं?
देखिए पूरे कार्यकाल के बाद सभी को खुश रखना किसी भी (जन-प्रतिनिधि) के लिए संभव नहीं होता। मान लीजिए अगर गाँव में कुल तीन काम होने हैं, मैंने दो करा दिए लेकिन तीसरा नहीं करा पाई तो लोग इसी तीसरे को लेकर आलोचना शुरु कर देंगे। आपने अगर मैंने पहली बार, जब से मेरी ग्राम-पंचायत है, तब से, पल्ली सभा (ओडीशा में ग्राम-सभा) की शुरुआत कराई… उनकी भागीदारी हो, इसके लिए प्रयास किए लेकिन मेरे ऊपर अनुसूचित जाति-जनजाति उत्पीड़न (एससी-एसटी एक्ट) के तहत मामला दर्ज़ करवा दिया गया। ये तो सिर्फ एक उदाहरण हैं… तो सौ फीसदी को खुश करना संभव नहीं। कुछ समर्थक भी निराश हो जाते हैं। 
 
… अब आगे दोबारा चुनाव लड़ेंगी सरपंच का?
नहीं… मैंने मना कर दिया है। अब नहीं। हालांकि हमारे यहाँ फिर से महिला सीट है लेकिन दूसरों को भी अवसर मिलने चाहिए। सबको आगे बढ़ना है।
 
तो अब क्या?
अभी हमारे यहाँ जिला-परिषद के भी चुनाव चल रहे हैं। हालांकि कोई प्रक्रिया शुरु नहीं हुई है लेकिन साथ से लोग कह रहे हैं कि इस बार मैं जिला परिषद के लिए लड़ूं… ये सीट भी महिलाओं के लिए आरक्षित है। देखिए… हैं क्या होता है।
 
भारतीय राजनीति में ऐसे कुछ उदाहरण हैं जहाँ लोगों ने अपना जीवन ग्राम-पंचायत से शुरु किया और केंद्र में मंत्री बनते हुए राजनीति के लगभग शिखर तक गए… क्या आप भी इस सोपान को इस्तेमाल करना चाहेंगी? 
ये मैं जनता पर छोड़ती हूँ। मेरा जीवन सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित है… जनता जो चाहेगी, वो मुझे जहाँ भेजेगी… जाउंगी। पंचायत से पार्लियामेंट तक भी!
 
नबीन बाबू से भी आपकी मुलाक़ात हुई है। क्या उन्होंने कभी आपसे पार्टी से जुड़ने के लिए कहा? 
नहीं… उनसे सिर्फ काम से संबंध में बात हुई। राज्य-सरकार को मेरा पूरा सहयोग रहा। राज्य-सरकार ने भी मेरी बातें सुनी। मुझे कई बार ग्रास-रुट पर क्या हो रहा है, संबंधित विषयों पर प्रतिनिधित्व करने के लिए कहा गया। 
ऐसे ही प्रतिनिधित्व करते हुए मैं पुणे में साल 2012 में हुई स्टूडेंड पार्लियामेंट (छात्र संसद) में गई। वहाँ मुझे 2 मिनट बोलने का समय दिया गया। उस समय मैंने कहा कि कौन कहता है कि महिलाओं को विशेष अवसरों की जरूरत है… कौन कहता है कि महिलाओं को आरक्षण की जरुरत है… मैंने कहा था-  नारी को पढ़ाओ, नारी बढ़ाओ… ये मेरा कॉन्सेप्ट था जो आज बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के नाम से चल रहा है। फिर मैंने इसे पॉवर-प्वॉइंट प्रज़ेन्टेशन के जरिए इसे समझाया। अन्ना हज़ारे जी भी थे वहाँ… फिर हरियाणा के एक सरपंच आए… वही बीवीपुर के सरपंच।
 
राजनीति में वे कौन सी चीजें हैं जिनसे आप नफ़रत करती हैं? दो-तीन चीजें… जो नहीं होनी चाहिए?
यहाँ जब मैं कुछ अलग, अच्छा करने की कोशिश करती हूँ तो राजनीति में बैठे शक्तिशाली लोग कोशिश करते हैं कि कैसे भी इसे रोका जाए… डायरेक्ट-इनडायरेक्ट कोशिश रहती  है। लेकिन जब आप अच्छा काम करते हैं तो ये सब चीजें पीछे छूट जाती हैं। इसमें मेरी मदद मीडिया ने भी खूब की है।
 
स्वच्छ भारत अभियान को आप कैसे देखती हैं?
मैंने अपने गाँव में लगभग तीन हज़ार शौचालय बनवाए हैं। इनमें 15 स्वतंत्र महिला शौचालय हैं, इसमें न सिर्फ शौचालय हैं बल्कि महिलाओं के लिए स्नानघर भी शामिल हैं।
अंतिम रुप से आरती जी का संदेश (खासकर युवाओं के लिए) था…
पढ़-लिखकर सिर्फ डॉक्टर-इंजीनियर बनने की ही न सोचें… गाँव आपका इंतज़ार कर रहे हैं। 
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