बजट-2016: असमानता कम करने की एक कोशिश

–डॉ. आद्य प्रसाद पाण्डेय (@APPandey13)

आर्थिक सर्वेक्षण ने साफ किया कि असमानता के मामले में भारत और अमेरिका लगभग एक ही स्तर पर हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी कहते हैं कि “असमानता कम करने का एक जरिया यह है कि अमीरों के उपभोग के सामानों  को बढ़ावा न दिया जाए” शायद बजट में इस बार यही किया गया है। छोटे कारोबारियोंए छोटा घर बनाने वालों को तो बजट राहत दे देता है पर ज्यादा कमाई करने वालों के प्रति बजट अधिक उदार नहीं है।

“अच्छी खेती सिर्फ अच्छी राजनीति ही नहीं है, यह अच्छा अर्थशास्त्र भी है”

कृषि

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बजट में घोषित किया कि वह अर्थव्यस्था को गति देने के लिए नौ (9) स्तंभों पर भरोसा कर रहे हैं. इनमें से पहला स्तंभ है कृषि। वित्त मंत्री के अनुसार अगले पांच सालों में किसानों की आय दोगुनी कर दी जाएगी। यह बहुत बड़ी घोषणा है। यह लक्ष्य मुश्किल तो है पर नामुमकिन नहीं। हरित क्रांति के दौरान हमने दुगुने के आस-पास की वृद्धि दर्ज कर चुके हैं। ग्रामीण रोजगार योजना मनरेगा का आवंटन बढ़ा दिया गया। एकीकृत ग्रामीण ई-मार्केट की बात कही गई। कुल मिलाकर खेती-किसानी की बेहतरी की बहुत घोषणाएं की गई। कुछ दिन पहले आर्थिक सर्वेक्षण ने एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात कही थी वह यह कि तमाम राज्यों में लगातार तीन बार वही राजनीतिक दल चुनकर आ पाए हैं जिन्होंने अपने राज्यों में विकास की दर तेज की है।  अच्छी खेती सिर्फ अच्छी राजनीति ही नहीं है, यह अच्छा अर्थशास्त्र भी है। खेती सकल घरेलू उत्पाद में भले ही सिर्फ 17 प्रतिशत का योगदान करती हो किन्तु खेती-किसानी पर निर्भर जनसंख्या की तादाद इस मुल्क़ की कुल आबादी की साठ प्रतिशत आबादी से ज्यादा है।

ग्रामीण विकास

87,765 करोड़ रुपए ग्रामीण विकास के लिए और 19,000 करोड़ रुपए ग्रामीण सड़क निर्माण के लिए रखे गए हैं। मनरेगा के लिए 38,500 करोड़ रुपए और निर्धन घरों तक रसोई गैस कनेक्शन पहुंचाने के लिए 2,000 करोड़ रुपए का प्रावधान नए बजट में है। विकास के लिए ग्रामीण क्षेत्र की मांग पूरी करना अपरिहार्य है। यह जानकर बजट में ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सेहत में सुधार के लिए कई अहम कदम उठाए गए हैं।

ये कदम दो आधार पर उठाए गए हैं, पहला, कृषि उत्पाद की बढ़ोत्तरी पर जोर दिया गया है। इसके लिए मृदा स्वास्थ्य कार्ड, एकीकृत ग्रामीण बाज़ार, डिजिटल इंडिया के तहत गाँव को जोड़ना एवं जैविक खेती सरीखी योजनाओं का प्रावधान किया गया है। तो दूसरी तरफ ग्रामीण आधारभूत ढांचे पर भी जोर दिया गया। इसी को ध्यान में रखते हुए ग्रामीण आवास, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के लिए बजटीय प्रावधान 4 गुना कर दिया गया है। मनरेगा के बजट को भी बढाया गया है।

स्वास्थ्य

बेसिक डायलिसिस उपकरण खरीदने में कुछ राहत दी गयी है। प्रति परिवार 1 लाख तक स्वास्थ्य कवर करने के लिए एक नई स्वास्थ्य सुरक्षा योजना को लागू किया गया है । पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) के माध्यम से राष्ट्रीय डायलिसिस सेवा सभी जिला अस्पतालों में लागू की जाएगी। वरिष्ठ नागरिकों को नई योजना के तहत 30,000 रुपये की अतिरिक्त स्वास्थ्य कवर मिल पाएगा। प्रधानमंत्री जन-औषधि योजना को मजबूत किया गया है। 300 जेनेरिक दवाओं की दुकान खोले जाने के लिए वित्तीय प्रबंध किए गए हैं।

बुनियादी ढांचा

केंद्रीय बजट में सड़कों और देश में राजमार्गों के विकास के लिए 55,000 करोड़ रुपये निर्धारित किया गया है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए बांड के माध्यम से 15,000 करोड़ रुपये जुटाने की अनुमति दी गई है, जबकि ग्रामीण सड़कों कार्यक्रम के लिए सरकार 19,000 करोड़ रूपए की व्यवस्था की गयी है।

सुशासन

सुशासन के लिए प्रक्रियागत सुधारों के साथ सूचना प्रोद्यौगिकी पर जोर देने की बात कही गई है। लाभार्थियों को सब्सिडी की अधिकतम लाभ मिले इसलिए आधार कार्ड को क़ानूनी जमा पहनाने की भी बात कही गयी है। एलपीजी डीबीटी(प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण) योजना की तरह अब उर्वरक सब्सिडी भी सीधे किसानों के खतों में जा पाएगी। 5.3 लाख पीडीएस (सार्वजिन वितरण) दुकानें भी स्वचालित की जाएंगी। पोंजी स्कीमों पर लगाम लगाने के लिए कड़े फैसले लिए जाएंगे और इसके लिए कड़े कानून बनाए जाएंगे।

शिक्षा एवं रोजगार

बेहतर एवं विश्व स्तरीय शिक्षा को सरकार ने अपना ध्येय बनाया है इसीलिए 2001 में शुरू किए गए सर्व शिक्षा अभियान के बजट में इजाफा किया गया है। इसी के तहत 62 नए नवोदय विद्यालय खोले जाने का लक्ष्य रखा गया। उच्च-शिक्षण संस्थाओं में आम छात्र को विश्वस्तरीय शिक्षा कम खर्च में उपलब्ध हो इसलिए 1000 करोड़ रुपये का प्रबंध किया गया है।

इसके साथ ही 1500 नए कौशल विकास केन्द्र खोले जाने हैंए जो युवाओं को रोजगार पाने में सहायक होंगे।। इसी तरह रोजगार सृजन की गति तेज करने के लिए स्टार्टअप इंडिया पर बल दिया गया हैए जो एक सही कदम है। इस समय सरकार के लिए सर्वाधिक प्राथमिकता का मामला युवाओं के लिए रोजगार अवसरों का सृजन है।

“करों को लेकर जो परिवर्तन बजट में दिखते हैं वे सब इस बात का सुनिश्चितीकरण लगते हैं कि मोदी सरकार को सूटबूट की सरकार न कहा जाए”

कर सुधार

इस बजट में अमीरों से अधिकाधिक टैक्स वसूलकर सीधे अन्नदाता को मदत देने के लिए राजकोषीय नीति की शुरुआत की गयी। एक करोड़ से अधिक की आय वाले लोगों पर मौजूदा 12 फीसदी सरचार्ज को बढाकर 15 प्रतिशत करने एवं 10 लाख से अधिक लाभांश पाने वाले लोगों पर 10 फीसदी की दर से टैक्स वसूलने का निर्णय लिया गया। सेवाकर में भी 0.5 %का सेस कर जोड़ा गया। बजट ने एक करोड़ रुपये से अधिक की आय वाले व्यक्तियों पर सरचार्ज 12 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया है। हजार रुपए से ज्यादा वाले ब्रांडेड कपड़ों पर उत्पाद शुल्क बढ़ा दिया है। दस लाख रुपए से अधिक लाभांश पाने वाले व्यक्तियों को दस प्रतिशत का अतिरिक्त टैक्स देना पड़ेगा। ये सब कदम इस बात का सुनिश्चितीकरण लगते हैं कि मोदी सरकार को सूटबूट की सरकार न कहा जाए।

“देखा जाए तो सरकार ने बैंकों की हालत में सुधार लाने के लिए कोई बड़ा कदम उठाने के बजाय रिस्ट्रक्चरिंग (पुनर्निमार्ण) करने का ही काम किया है”

वित्तीय सुधार

वित्त मंत्री ने बजट पेश करते हुए बताया की हालिया दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों में अवैध जमा राशि प्राप्त करने की स्कीमों (पोंजी स्कीम) से जनता के धोखाधड़ी का शिकार होने की घटनाओं में वृद्धि हुई है। इसमें सबसे ज्यादा नुकसान गरीब एवं वित्तीय जानकारी न रखने वाले लोगों का होता है। कॉर्पोरेट बांड बाज़ार को काफी अहम् माना जा रहा है। इसके लिए वित्त मंत्री ने छः कदम उठाने की बात भी कही है। इसके तहत भारतीय जीवन बीमा निगम को ढांचागत परियोजनाओं को लोन देने के लिए एक विशेष कोष का गठन करने को कहा गया है। जहां तक बैंकों में सुधार के लिए कदम उठाने और 25000 करोड़ रुपये मुहैया कराने की बात है तो यह पर्याप्त नहीं। वास्तव में देखा जाए तो सरकार ने बैंकों की हालत में सुधार लाने के लिए कोई बड़ा कदम उठाने के बजाय रिस्ट्रक्चरिंग (पुनर्निमार्ण) करने का ही काम किया है।

“इस बजट ने बहुत ही करीने से और शायद बहुत ही शांति से देश में लोक-लुभावन नीतियों पर होने वाली राजनीति पर हमेशा के लिया पर्दा गिरा दिया है”

खजाने की सेहत

वित्तीय वर्ष 2015-16 में 3.9%के राजकोषीय घाटे के बजट का अनुमान था। जबकि राजस्व घटे का अनुमान 2.8% था। इस लक्ष्य से सरकार की विश्वसनीयता जुडी थी, जिसे सरकार ने हासिल कर लिया। वित्तीय समेकन के अपने कुछ सकारात्मक पहलू हैं लेकिन इनकी कीमत भी है। हालांकि यह दुनिया को सकारात्मक संदेश देता है। खासकर रिज़र्व बैंक के लिए इससे नीतिगत दरों को घटने का रास्ता खुलता है। सरकारी नीतियों में भी इस गेम-चेंजर कदम से ही वित्त मंत्री ने बजट 2016-17 में राजकोषीय संतुलन बनाये रखने का दमख़म दिखाया। इस बजट ने बहुत ही करीने से और शायद बहुत ही शांति से देश में लोक-लुभावन नीतियों पर होने वाली राजनीति पर हमेशा के लिया पर्दा गिरा दिया है। अब तो न तो चुनाव को ध्यान में रखकर लोक लुभावन नीतियों को जारी रखा जाएगा और न ही किसी राजनेता के नाम पर अन्तकाल तक सरकारी खजाने में सेंध लगाने वाली नीतियां जारी रहेंगी।

निष्कर्ष

वित्तमंत्री द्वारा पेश किए गए बजट में तमाम छोटी-छोटी बातों का भी ध्यान रखा गया है जो दीर्घकालिक दृष्टि से बेहद अहम हैं। ऐसी ही एक योजना सभी घरों में एलपीजी उपलब्ध कराने की है। इससे पर्यावरण को तो फायदा होगा ही, साथ ही महिलाओं को ईंधन के रूप में लकड़ी का इस्तेमाल करने से होने वाले तमाम रोगों से भी निजात मिलेगी। इसी तरह देश के 18,500 गांवों में एक मई-2018 तक बिजली पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। यह भी एक महत्वपूर्ण कदम है।

“अकेले विजय माल्या ने बैंकों की 8,000 करोड़ की पूंजी डुबो दी है, जबकि सरकार ने बजट में बैंकों को महज़ 25,000 करोड़ देने का ऐलान किया है, जो नाकाफी है”

बजट ने सरकारी बैंकों की पूंजी में 25,000 करोड़ रुपए डालने की घोषणा की है। यह रकम बिल्कुल नाकाफी है। मोटे तौर पर यों समझा जा सकता है कि अकेले एक उद्योगपति विजय माल्या ने करीब 8000 करोड़ की पूंजी बैंकों की डुबो दी है। 25000 करोड़ रुपए में सारे सरकारी बैंकों का भला नहीं हो पाएगा। खास तौर पर छोटे सरकारी बैंकों के मामले में तो रकम बढ़ानी होगी। बड़े सरकारी बैंक तो फिर भी कहीं से संसाधनों की व्यवस्था कर लेंगे। पर छोटे बैंकों के लिए दिक्कत होगी। कुल मिलाकर यह बजट ठोस रूप में किसानों-खेतों की ओर जाता दिखता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि खेती-किसानी की बेहतरी समूची अर्थव्यवस्था की बेहतरी में तब्दील हो।

(लेखक आद्य प्रसाद पाण्डेय बनारस हिंदू विश्वविद्याल में अर्थशास्त्र विभाग के प्रमुख हैं, यहाँ व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं) [sgmb id=”1″]

1 Comment


  1. // Reply

    आदरणीय महोदय मैंने आपकी रिपोर्ट पढ़ी कुछ बिंदुओं को छोड़ कर मुझे ज्यादा कुछ समझ नहीं आया ।पूरी रिपोर्ट सरकार की वर्तमान बजट में पेश योजनाओं का ब्यौरा भर लग रही है (कुछ उत्कृष्ट टिप्पणियों को छोड़ कर )। अर्थशास्त्र की सीमित जानकारी होने के कारण एक पाठक के तौर पर मैं इन योजनाओं के बारे में और इन योजनाओं से होंने वाले निकटवर्ती और दूरगामी प्रभावों के बारे में जानना चाहूंगा ।
    और वो भी सरल शब्दों में विस्तार से विश्लेषणात्मक जानकारी। अतः मैं वेबसाइट से चाहूंगा इस विषय पर एक रिपोर्ट और छापे जो थोड़ी विस्तृत हो और सरलता से बजट के प्रभावो को समझाए ।
    धन्यवाद और अज्ञानता के लिए क्षमा सहित ।

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