चर्चा के चबूतरे पर जगमोहन: कश्मीर, जिहाद और पंडितों का निर्वासन

28 साल पहले 1990 में, ऐसा देखने में आया कि कश्मीर से वहाँ के अल्पसंख्यक समुदाय (कश्मीरी पंडित) को बड़ी संख्या में बल-पूर्वक निर्वासन का सामना करना पड़ा। 19 जनवरी 1990 की रात सैकड़ों की संख्या में लाउडस्पीकरों ने भारत-विरोधी, पंडित विरोधी और आज़ादी समर्थक नारे लगाने शुरु कर दिए… राज्य का तंत्र लगभग-लगभग ख़त्म हो गया था।
कश्मीरी पंडितों से कहा गया कि वे या तो घर छोड़ दें या मरने को तैयार रहें। ऐसी स्थिति में कठोर प्रशासक के रुप में अपनी पहचान बनाने वाले जगमोहन को दूसरी बार वहाँ राज्यपाल बनाकर भेजा गया।
इस तरह 1990 के पहले और बाद में क्या हुआ था? वे कौन से कारण थे जिसने कश्मीर को संकट के मुहाने पर ला खड़ा किया… और कश्मीरी पंडितों के निर्वासन के लिए कौन जिम्मेदार था? चौपाल पर चर्चा के चबूतरे पर अमित और आशीष कौल ने बात की जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल और पद्म विभूषण से सम्मानित जगमोहन से और जानने की कोशिश की उन तमाम कारणों को जो इस समस्या के लिए उत्तरदायी थे। मूल अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किया है अभिषेक हर्षवर्धन ने, पेश हैं बातचीत के संपादित अंश…

जनवरी 1990 में जम्मू कश्मीर के राज्यपाल का कार्यभार ग्रहण करने से पहले, सरकारी तंत्र इतना लाचार और प्रभावहीन क्यों था? क्या आपको लगता है कि कश्मीर में व्यापित भारत विरोधी तत्वों और अलगाववाद के किये, कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस भी उतनी ही जिम्मेदार है, जितने कि अलगाववादी ?
19 जनवरी 1990 को अपने दूसरे कार्यकाल के लिए राज्य में पहुँचने से पहले, 6 माह के समय में फारूक अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नेशनल कांफ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन सरकार ने वर्जनाहीनता की सारी हदें पार कर दीं थीं, और अप्रत्यक्ष रूप से आतंकियों को घाटी में एकछत्र राज स्थापित करने के सभी अधिकार दे दिए थे। 19 जून 1989 से जनवरी 1990 के बीच घाटी में 319 हिंसक घटनाएं हुईं, जिनमें 21 सशस्त्र हमले, 114 बम ब्लास्ट, 112 आगजनी की घटनाएं, और भीड़ द्वारा हिंसा के 72 मामले थे। अकेले अक्टूबर महीने में बम बिस्फोट की 50 तथा उग्रवादियों द्वारा गोलोबारी की 15 घटनाएं हुईं थीं।

पूरी दुनिया को यह दिखाने के लिए, कि घाटी पर उनका पूरा अधिकार हो चुका है, उग्रवादियों ने 8 दिसंबर को केंद्रीय गृह मंत्री की बेटी, डॉ. रुबिया सईद का अपहरण कर लिया, और उन्हें तभी आज़ाद किया जब सरकार ने उनके सामने आत्मसमर्पण कर दिया तथा 5 प्रमुख आतंकवादियों को रिहा करने की उनकी शर्त को मान लिया। इसका परिणाम हुआ, कि घाटी में विध्वंस और आतंकवाद की घटनाएं और ज्यादा बढ़ गईं। इंटेलिजेंस ब्यूरो के दो अधिकारियों की हत्या कर दी गई, क्योंकि स्थानीय पुलिस के अंदरूनी विध्वंसकारी तत्वों द्वारा उन अधिकारियों के क्रियाकलापों की जानकारी आतंकियों को लग गई थी।

“आवश्यक क़दमों की अनदेखी की बात छोड़िए, सबसे ज्यादा बढ़ावा तो तुष्टिकरण को दिया गया”

आवश्यक क़दमों की अनदेखी की बात छोड़िए, सबसे ज्यादा बढ़ावा तो तुष्टिकरण को दिया गया। मैंने अपनी किताब ‘माई फ्रोजेन टर्बुलेंस इन कश्मीर’ में उल्लेखित कई केसों में से दो उदाहरण यहाँ दिए जा सकते हैं।

पहला, जब सेवाओं में घुसपैठ गंभीर होती जा रही थी, उस समय ‘इंटेलिजेंस’ भी प्रभावहीन होता जा रहा था, और जब मीडिया लगातार TOPAC जैसी विस्फोटक ख़बरें उजागर कर रहा था, तभी फारुख़ अब्दुल्ला सरकार ने उग्रवादियों के तुष्टिकरण को बढ़ावा देना वाला एक निर्णय लिया। उन्होंने 70 ऐसे ख़तरानाक़ उग्रवादियों को रिहा कर दिया, जिनकी गिरफ़्तारी को जम्मू कश्मीर उच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व वाली एक सलाहकार समिति ने जायज ठहराया था। उन उग्रवादियों की ट्रेनिंग पाक अधिकृत कश्मीर में हुयी थी, तथा उनके आईएसआई और उसके एजेंटो से नजदीकी संबंध थे। उन्हें नियंत्रण रेखा (एलओसी) पार करने के सभी आड़े तिरछे, गूढ़ रास्ते मालूम थे। उनकी यकायक रिहाई ने उन्हें आतंक और दहशत के नेटवर्क में ऊंचा ओहदा दिलवाया, और वे हथियार लाने के लिए पकिस्तान जा सके, जिनसे हत्या, अपहरण, और अन्य तरह की आतंकी गतिविधियों को अंजाम दिया जा सके।

दूसरा, आईएसआई और इसके एजेंटो द्वारा विचारित और प्रायोजित एक योजना के तहत, घाटी में घृणा और हिंसा फ़ैलाने वाली एक बहुत बड़ी मशीनरी को काम पर लगाया गया। अनेकों मस्जिदों में उच्च तीव्रता वाले लाउड स्पीकर लगाए गए, जिनसे लगातार आज़ादी परस्त, पाकिस्तान परस्त, और भारत विरोधी नारे लगाए जाते थे, और रियासत के खिलाफ ‘जिहाद’ बुलंद करने की पुकारें लगाईं जाती थीं। इसके साथ ही, एक बड़े पैमाने पर धर्मिक उन्माद भड़काने वाली प्रचार सामग्री का निर्माण किया गया और उसे जगह-जगह प्रचारित किया गया। डॉ. फारुख़ अब्दुल्ला की गठबंधन सरकार ने हिंसा भड़कने से रोकने के लिए इन लाउड स्पीकरों को हटवाने के लिए कोई एक्शन नहीं लिया। ना ही उन्होंने इस विध्वंसकारी सामग्री पर प्रतिबंध लागाने के लिए कोई कदम उठाया। इस प्रकार, इन ज़हरीले विचारों को आम कश्मीरी जनमानस के दिमाग में घुसपैठ करने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया गया।

साल 1984 में राज्यपाल के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान, क्या आपने राज्य में आतंकवाद के निशान देखे थे?
वास्तव में, एतिहासिक रुप से तमाम दुःखद बुराइयों की आधारशिला बिलकुल शुरुआत में रखी दी गयी थी। उदाहरणस्वरुप अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35A के प्रावधान इन्हीं गलतियों में से दो हैं। मैंने इसका अंदाजा सन 1984 में ही लगा लिया था, जिसे मैंने अपनी किताब के पहले संस्करण में लिखा: “ये प्रावधान ‘दो राष्ट्र सिद्धांत’ की दूषित विरासत को जीवित रखते हैं, और ‘एक भारत’ के विचार को कुंठित करते हैं। ये उस आत्मसेवी कुलतंत्र (वंशवादी शासन) की सहायता करते हैं, जो असहाय लोगों की संवैधानिक अशिक्षा का फायदा उठाते हैं, उनमें कपोल-कल्पनावाद का बीज बोते हैं और समाज में भ्रष्टकारिता के रोगाणुओं का पालन पोषण करते हैं। ये घाटी में एक हिंसक भूकंप का अभिकेंद्र बन सकती हैं। एक भूकंप, जिसकी थरथराहट अप्रत्याशित दुष्परिणामों के साथ पूरे देश में महसूस की जा सकेगी”

जो कुछ हुआ उसके लिए आपने 370 और 35A को दोषी मानते हुए इनका जिक्र किया है, क्या आपको लगता है कि ये प्रावधान राज्य के लोगों के लिए अन्यकारी या भेदभावकारी रहे हैं?
ये प्रावधान निष्पक्ष शासन के मूल सिद्धांतों की खिलाफत करते हैं, और परिणामस्वरूप एक ऐसी भूमि का निर्माण करते हैं, जहाँ कोई न्याय नहीं होता; अशिष्टता और विरोधभासों से भरी एक भूमि। पश्चिमी पाकिस्तान के विस्थापितों की मार्मिक कहानी इस प्रक्रिया का मात्र एक उदाहरण है।
पश्चिमी पाकिस्तान से हज़ारों परिवार पलायन करके जम्मू कश्मीर आए, और यहीं बस गए। अब वे यहाँ राज्य में पिछले 7 से ज्यादा दशक से रह रहे हैं। लेकिन ये अभागे लोग, जिन्हें उनके नियंत्रण से बाहर वाली परिस्थितियों की बाध्यता के कारण जबरन पलायन करने को मजबूर किया गया, उन्हें आज भी मूल मानव अधिकार मयस्सर नहीं हैं। उन्हें, उनके बच्चों, और उनके प्रपौत्र/प्रपौत्रियों को आज भी जम्मू कश्मीर में कोई नागरिकता अधिकार नहीं है। वे राज्य विधानसभा या मुन्सिपलिटी या पंचायत के चुनावों में प्रतिभाग नहीं कर सकते। वे राज्य सरकार अथवा उसकी एजेंसियों से ऋण प्राप्त नहीं कर सकते। युवा लड़कों और लड़कियों को मेडिकल, इंजीनियरिंग, या कृषि कॉलेजों में दाखिला नहीं मिलता, भले ही ये संस्थान केंद्र सरकार के वित्तीय सहयोग से स्थापित किए गए हों।

बहुत से भारतीय ही भारतीय एकता और अखंडता के सबसे बुरे दुश्मन साबित हुए हैं”

इस संबंध में कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाए जा सका?
दुर्भाग्यवश, वो लोग जिनके हाथों में देश की तक़दीर थी, उन्होंने जरुरी सुधार लागू करने में कोताही बरती। वे अपनी अदूरदर्शी और स्वार्थपरक राजनीति के कैदी बने रहे। मीडिया के एक बड़े हिस्से ने उदार दिखने की ललक में इन अस्थिरताकारक प्रावधानों के प्रति बिलकुल क्षमयाचाकों की तरह व्यव्हार किया, और अनुच्छेद 370, 371A, 371G तथा इसी तरह के अन्य अनुच्छेदों के बीच समानता पर आधारित भ्रामक प्रश्न उठाए, ताकि जनता के दिमाग में संदेह का बीज-बपन किया जा सके। यह समानता पूरी तरह झूठी एवं अमान्य है। संविधान के अधीन राज्यों में, जम्मू कश्मीर के अतिरिक्त, कहीं भी, अलग संविधान, अलग नागरिकता, संविधान द्वारा संरक्षित मौलिक अधिकारों की सीमित मान्यता, निवास संबंधी शक्तियों का विशेषाधिकार, अलग निर्वाचन क्षेत्र सीमांकन आयोग, राज्य संविधान के अधीन राज्यपाल की नियुक्ति, उसका कार्यकाल, वेतन और भत्तों का प्रावधान नहीं है।
ये और कुछ नहीं बल्कि अलगाववाद, भ्रष्टकारिता और पृथकवादिता के विकास हेतु अनुकूल वातावरण है। खेदजनक है, कि इस परिप्रेक्ष्य में, बहुत से भारतीय ही भारतीय एकता और अखंडता के सबसे बुरे दुश्मन साबित हुए हैं।

यदि घाटी में कश्मीरी पंडितों के सितंबर 1989 से अब तक के पलायन की बात करें, तो ये सब पाकिस्तान की आईएसआई और कट्टर स्थानीय उग्रवादियों की एक शैतानी योजना के अंतर्गत हुआ है “

एक प्रशासक के तौर पर, और एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर, जिसने कश्मीर के आतंकवाद को बड़ी नजदीकी से देखा और समझा है, क्या आप इस बात से सहमत हैं कि कश्मीरी आतंकवाद  न केवल ‘एंटी-इण्डिया’ है, बल्कि ‘एंटी-हिन्दू’ भी है? यदि हाँ, तो क्यों?
ये न केवल ‘एंटी-इण्डिया’ और ‘एंटी-हिंदू’ है, बल्कि ये ‘एंटी-इस्लाम’ भी है, जैसा कि ये वर्तमान रुढ़िवादी और कल्पनावादी शक्तियों के आगमन से पहले कश्मीर में प्रचलित था। यदि घाटी में कश्मीरी पंडितों के सितंबर 1989 से अब तक के पलायन की बात करें, तो ये सब पाकिस्तान की आईएसआई और कट्टर स्थानीय उग्रवादियों की एक शैतानी योजना के अंतर्गत हुआ है। कश्मीरी पंडित समुदाय के प्रमुख सदस्यों को एक एक कर पकड़ा गया, और उन्हें मार डाला गया। उदाहरणस्वरुप, भारतीय जनता पार्टी के नेता टिक्का लाल टिप्लू की 14 सितंबर, (आंतकी मक़बूल भट्ट को सजा सुनाने वाले) जज एन. के. गंजू की 4 नवंबर, और पत्रकार पी. एन. भट्ट की 28 दिसंबर को गोली मारकर हत्या कर दी गयी।

भयाक्रांत पंडित समुदाय ने 16 जनवरी, 1990 को राज्यपाल को दिए एक ज्ञापन में कहा: “उग्रवादी अब घाटी के वास्तविक शासक बन गए हैं। घाटी में होने वाली घटनाएं, अल्पसंख्यकों पर हमले के उनके नियोजित लक्ष्यों के बारे में कट्टरपंथियों के डिज़ाइन का संकेत देती हैं। पलायन की गति अब और ज्यादा बढ़ गयी है। पुलिस द्वारा अल्पसंख्यक समुदाय का एक भी आक्रमणकारी नहीं पकड़ा गया”

आप पर इस बात के भी आरोप लगते हैं कि कश्मीरी पंडितों के निर्वासन के लिए आप ही जिम्मेदार हैं?
इन आरोपों के जवाब में, कि मैंने पंडितों को पलायन के लिए प्रोत्साहित किया, श्रीनगर टाइम्स के मुख्य संपादक गुलाम मोहम्मद सोफ़ी ने अपने एक हालिया इंटरव्यू में कहा, “यह बिलकुल सफ़ेद झूठ है। ये सब एक चरणबद्ध दुष्प्रचार का हिस्सा था। पंडितों का पलायन एक पूर्व क्रियान्वित योजना का परिणाम था। जगमोहन का इससे कोई लेना देना नहीं है। जब उन्होंने 19 जनवरी, 1990 को अपने दूसरे कार्यकाल का कार्यभार संभाला, तब परिस्थितियां अत्यंत भयावह थीं”

“ब्लू-स्टार या तियानानमेन स्क्वायर की भांति कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना हुए बिना, मैंने षड्यंत्रकारियों और उग्रवादियों की सभी योजनाओं पर पानी फेर दिया “

फिर ऐसा क्या कारण था कि आपके विरुद्ध व्यक्तिगत रूप से बड़े स्तर पर एक दुष्प्रचार अभियान चलाया गया?
इस अभियान की एक बड़ी भयानक पृष्ठभूमि थी। इससे पहले कि ये ‘पाकिस्तान परस्त’ और ‘आज़ादी परस्त’ तत्व घाटी को अपने जबड़ों में भर पाते, मैं इसे एक ऐसी सुनियोजित, बहुआयामी रणनीति के माध्यम से संघ (सरकार) के सामने रखने में सफल हो गया, जिसका क्रियान्वयन 19 से 26 जनवरी के बीच बड़ी दृढ़ता और तेजी के साथ किया गया था। ब्लू-स्टार या तियानानमेन स्क्वायर की भांति कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना हुए बिना, मैंने षड्यंत्रकारियों और उग्रवादियों की सभी योजनाओं पर पानी फेर दिया।
पाकिस्तान के शासक, जो यह आशा लगाए बैठे थे की यह ज्यादा से ज्यादा एक सप्ताह का मसला है, और उसके बाद कश्मीर घाटी पके सेब की तरह उनकी गोद में आ कर गिर पड़ेगी, अपनी योजना असफल होने से भड़क उठे। उन्होंने ये कभी नहीं सोचा था कि एलओसी के उस पार, भारतीय पक्ष का कोई आदमी इस तरह का कदम उठाएगा। उन्हें आभास हो गया था कि उनके रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा मैं ही हूँ। उन्हें इस बात का भी इल्म था, कि अप्रैल 1984 से जून 1989 तक के अपने पहले कार्यकाल में मैंने घाटी के लोगों, और अधिकारियों से अच्छी घनिष्ठता बना ली है। वो जानते थे कि मुझमें उनके आतंक और विध्वंस का नेटवर्क ध्वस्त करने की, सरकारी तंत्र को पटरी पर लाने की, और आम कश्मीरियों को ये समझाने की क़ाबिलियत है, कि उनकी संवैधानिक अशिक्षा का फायदा उठाया जा रहा है, अन्य भारतियों की तरह वे भी स्वतंत्र है, उनकी सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान संरक्षित रखी जाएगी, और केंद्र सरकार की तरफ से एक भारी वित्तीय सहयोग उन्हें प्रतिवर्ष उपलब्ध कराया जाता है। इसलिए पाकिस्तान ने व्यक्तिगत रूप से मुझ पर पलटकर हमला करने का निश्चय किया, और मेरी छवि, जो मैंने अपने पहले कार्यकाल में बनाई थी, उसे धूमिल करने को अपनी योजनाओं में सबसे ऊपर शामिल किया, ताकि मुझे राज्य से बहार फेंका जा सके।

“बेनजीर भुट्टो ने प्रधानमंत्री, गृहमंत्री या अन्य किसी प्रमुख भारतीय प्रमुख को नहीं, बल्कि मुझे टारगेट किया, क्योंकि वो जानती थीं कि मुझे कश्मीरी राजनीति और प्रशासन की गहराइयों का भली-भांति ज्ञान था और मेरे पास उस योजना के तमाम घटकों से लड़ने और उन्हें हतोत्साहित करने की क़ाबिलियत थी”

तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो स्वयं मुजफ्फराबाद आईं, और कश्मीरियों को मेरे खिलाफ भड़काया। एक टेलीविजन भाषण के दौरान, दाहिने हाथ को बाएं हाथ की गद्दी पर पटकते हुए किया गया, उनका आश्चर्यचकित कर देने वाला आश्चर्य-जनक व्यवहार (कटिंग जेस्चर) और जोर-जोर से गुस्से में जग-जग मो-मो हन-हन चिल्लाना मुझे अभी तक याद है। उन्होंने प्रधानमंत्री, गृहमंत्री या अन्य किसी प्रमुख भारतीय प्रमुख को नहीं, बल्कि मुझे टारगेट किया, क्योंकि वो जानती थीं कि मुझे कश्मीरी राजनीति और प्रशासन की गहराइयों का भली-भांति ज्ञान था और मेरे पास उस योजना के तमाम घटकों से लड़ने और उन्हें हतोत्साहित करने की क़ाबिलियत थी, जो उनकी आईएसआई द्वारा निर्दयतापूर्वक चलाया जा रहा था।

“दृष्टिकोण और व्यावहारिक रवैये में ये बदलाव एक ऐसी नई पद्धति सृजित कर सकते हैं, जो तुष्टिकरण और आतंक से मुक्त है, और एक शक्तिशाली, ज्ञानसम्पन्न, तथा विकास पथगामी भारत के लक्ष्यों को पूरा करने में मदद कर सकती है।”

नरेंद्र मोदी के शासनकाल में घाटी की स्थिति में क्या बदलाव आए हैं? भविष्य सुधार के लिए आप उनमें कितनी क्षमताएं मापते हैं?
जैसा कि मैंने अपनी किताब ‘माई फ्रोजेन टर्बुलेंस’ के बारहवें संस्करण में लिखा है, नरेंद्र मोदी सरकार के पहले तक की उत्तरवर्ती सरकारें किसी न किसी रूप में शिथिलता और सतहीपने की राजनीति के कारण बंधित बनी रहीं। लेकिन अब इसमें एक मूलभूत बदलाव हुआ है। दृढ़ व्यव्हारिकता के दृष्टिकोण, और इसकी रुपरेखा को अपनाया गया है, जैसा कि अध्याय ‘ऑनवर्ड टू अ न्यू रिज़ोल्व’ में परिभाषित है। पाकिस्तान की तुलना में, इसके सात घटकों के आलावा, जिनमें ‘निवारण’ का सिद्धांत, ‘सामर्थ्य’ का सिद्धांत, ‘सक्रियतावाद’ का सिद्धांत, और ‘रक्षात्मक आक्रामक’ होने का सिद्धांत सम्मलित है, यह स्पष्ट कर दिया गया है कि जम्मू कश्मीर समस्या के समाधान का ढांचा, केवल भारत संघ के अधीन, इन सात तख्तों पर रखा जा सकता है: इंसानियत, जम्हूरियत, कश्मीरियत, एकता, ममता, विकास और विश्वास।

दृष्टिकोण और व्यावहारिक रवैये में ये बदलाव एक ऐसी नई पद्धति सृजित कर सकते हैं, जो तुष्टिकरण और आतंक से मुक्त है, और एक शक्तिशाली, ज्ञानसम्पन्न, तथा विकास पथगामी भारत के लक्ष्यों को पूरा करने में मदद कर सकती है।

(आशीष कौल चौपाल में अंग्रेजी संपादिका के संबंधी हैं)

चौपाल की पाठशाला:-
अनुच्छेद 370. जम्मू-कश्मीर के संबंध में अस्थायी प्रावधान
अनुच्छेद 371. महाराष्ट्र और गुजरात राज्य (के कुछ क्षेत्रों) के लिए विशेष उपबंध
अनुच्छेद 371A. नागालैंड राज्य के लिए विशेष उपबंध
अनुच्छेद 371G. मिज़ोरम राज्य के लिए विशेष उपबंध
जम्मू-कश्मीर के लिए खास प्रावधान- अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर राज्य को अलग संविधान, अलग नागरिकता जैसे विशेष प्रावधान दिए गए हैं, जो किसी भी अन्य राज्य के पास नहीं हैं।
35A. 14 मई 1954 को तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा एक अध्यादेश के जरिए भारत के संविधान में एक नया अनुच्छेद 35A जोड़ दिया गया। अनुच्छेद 35A जम्मू-कश्मीर की विधान सभा को यह अधिकार देता है कि वह ‘स्थायी नागरिक’ की परिभाषा तय कर सके। चूंकि यह एक अध्यादेश के जरिए जोड़ा गया तो अनुच्छेद 35A (कैपिटल ए) संविधान की किसी भी किताब में नहीं है। हालांकि संविधान में अनुच्छेद 35a (स्माल ए) है, जिसका संबंध मूल अधिकारों से है। इसका जम्मू-कश्मीर से कोई संबंध नहीं है।

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