भोपाल गैस त्रासदी: गोरखपुर एक्सप्रेस, जो स्टेशन पर नहीं रुकी

यह कहानी भोपाल गैस त्रासदी के समय भोपाल रेलवे स्टेशन पर आने वाली गोरखपुर एक्सप्रेस की है, जो लाशों से पटे भोपाल स्टेशन की तरफ बढ़ रही थी। पूरा स्टेशन मिथाइल आइसोसाइनाइट गैस की चपेट में आ चुका था, ऐसे में अगर ट्रेन स्टेशन पर रुकती तो मृतकों की संख्या में निश्चित इज़ाफ़ा होता। ऐसी स्थिति में स्टेशन मास्टर ने कुलियों के साथ मिलकर क्या किया, स्वयं पढ़िए। यह किस्सा डोमिनीक लापिएर और जेवियर मोरो की किताब  फाइव पास्ट मिडनाइट इन भोपाल (हिंदी संस्करण)से लिया गया है। पेश हैं संपादित अंश…


स्टेशन पर करीब एक सैंकड़ा कुली गोरखपुर एक्सप्रेस के आने का इंतज़ार कर रहे थे। उन्हीं में से दो लोगों ने महसूस किया कि उनके गले और आंखों में तेज़ जलन महसूस हो रही है। ट्रेन से आने वाले यात्रियों की प्रतीक्षा में बैठे लोगों को भी ऐसा महसूस होने लगा। उन्हीं में एक कुली सतीश लाल ने कहा “लगता है मालगाड़ी पर रखे कंटेनर से किसी चीज़ का रिसाव हो रहा है”
लाल गलत थे। यह गैस कहीं और से आ रही थी। तभी दो कुली दौड़कर स्टेशन मास्टर के ऑफिस की ओर गए। उप-स्टेशन मास्टर बी.के. शर्मा संकेतों वाले बोर्ड में पिनों में से एक को अभी हटा रहे थे। गोरखपुर एक्सप्रेस बीस मिनट में स्टेशन पर आने वाली थी।
लाल ने चिल्लाकर कहा, “साहब बहुत कुछ गड़बड़ हो गया है। लोग गला फाड़-फाड़कर खांस रहे हैं, आप स्वयं देख लें”
शर्मा अपने साथियों के साथ आनन-फानन में अपने ऑफिस से बाहर प्लेटफॉर्म की तरफ दौड़े, लेकिन वे ऐसा नहीं कर सके क्योंकि हवा में घुली जहरीली गैस ने उनके चेहरे को झुलसा दिया।
तभी उनके दफ़्तर में रखे इंटरनल फोन की घंटी बजी। फोन पर रेलवे के ही एक अन्य कर्मचारी, जो निशादपुरा ईंधन डिपो पर तैनात था, ने फोन उठते ही बताया कि कार्बाइड फैक्ट्री में विस्फोट हो चुका है और जल्द ही गैस स्टेशन की तरफ आने वाली है।

लेकिन गैस तो आ चुकी थी। अब क्या करना होगा? उप-स्टेशन मास्टर शर्मा ने सोचा कि सबसे पहले गोरखपुर एक्स्प्रेस को यहाँ आने रोकना होगा। इसके लिए उन्होंने भोपाल से 12 मील पहले पड़ने वाले विदिशा स्टेशन पर संपर्क किया। जवाब मिला कि “ट्रैन अभी-अभी छूट चुकी है”

शर्मा के मुंह से निकला हे भगवान! सत्यानाश…

अब क्या हो… शर्मा ने अपने संकेतों से भरे बोर्ड में फिर से देखा कि विदिशा और भोपाल के बीच कहीं कोई लाल बत्ती का सिग्नल है क्या, जिससे ट्रेन को बीच में ही रोका जा सके? लेकिन यहाँ भी निराशा हाथ लगी क्योंकि ऐसी कोई बत्ती, ऐसा कोई सिग्नल विदिशा और भोपाल स्टेशन के बीच नहीं था।

इतना सुनने के बाद रेलवे के ही एक अन्य कर्मचारी और शर्मा के सहायक पटेल ने कहा “अब तो हमें ट्रेन के सामने जलती हुई मशाल ले, दौड़कर इंजन चालक को रुकने का संकेत देना होगा”

एक क्षण के लिए शर्मा को ये सुझाव बेवकूफाना लगा कि आधी रात को पूरी गति से चल रही ट्रेन को ऐसे कैसे रोका जा सकता है? लेकिन अगले ही क्षण शर्मा ने अपने विचार बदल दिए। शर्मा ने सहायक पटेल से कहा “आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। हम लालटेनों की सहायता से ट्रेन को रोक सकते हैं। जाओ… कुछ ताकतवार कुलियों को पकड़ लाओ”

पटेल अपना गमछा भिगोने के लिए कमरे के अंत में लगे वॉश-बेसिन की ओर दौड़े। गीले गमछे को निचोड़कर उन्होंने उसे अपने चेहरे पर लगा लिया और बाहर निकल आए।

बी.के. शर्मा ने मिशन के महत्व पर जोर देते हुए कहा, ”यदि तुम गोरखपुर एक्सप्रेस को रोक सके, तो तुम सैकड़ों लोगों की जान बचा सकते हो” शर्मा ने आगे कहा “तुम हीरो बन जाओगे और तुम्हें इसके लिए सम्मानित किया जाएगा” अलंकृत किए जाने की संभावनाओं से चार लोगों के बुझे हुए चहरों पर थोड़ी सी खुशी आ गई।
शर्मा ने अपने हाथों को अपने सीने से लगाकर कहा “भगवान तुम्हारी रक्षा करे। रखरखाव कक्ष में तुम्हें कुछ लालटेनें मिल जाएंगी। भगवान तुम्हारा साथ दे”
अब शर्मा के शब्द खामोश हो चुके थे लेकिन वे मन ही मन सोच रहे थे। “ये लोग वास्तव में हीरो हैं”

प्रतीकात्मक तस्वीर, साभार- इंटरनेट

हाथों में लालटेन पकड़े ये चारों लोग धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे। उन्हें जरा भी एहसास नहीं था कि वे रेल पटरियों पर बिछी गिट्टी पर लड़खड़ाते हुए असंख्य छोटे-छोटे बादलों के बीच से गुजर रहे हैं। चारों ओर मौत का सन्नाटा था, लेकिन रुकने का समय नहीं था।
तभी इस सन्नाटे को चीरती हुई एक आवाज़ सुनाई दी। यह आवाज़ कहीं और से नहीं, बल्कि गोरखपुर एक्सप्रेस की सीटी की थी। चारों लोग लालटेन लिए इसे रोकने के लिए दौड़े, लेकिन वे जल्द ही थक गए। ट्रेन तक पहुंचते-पहुंचते जहरीली गैस उनके गीले कपड़ों को भेद चुकी थी। उनके फेफड़े तड़फड़ाने लगे, लालटेनें हाथ से गिरी जा रहीं थीं, लेकिन फिर भी वे आगे बढ़े।
लड़खड़ाते, तड़फड़ाते और उबकाई करते उन चारों लोगों ने जैसे-तैसे ट्रेन चालक को इशारा किया लेकिन गोरखपुर एक्सप्रेस के चालक ने यह इशारा नहीं समझा। उसने समझा कि ये पियक्कड़ लोग हैं, जो रेलवे लाइन को नहीं समझ पा रहे हैं। ट्रेन चलती रही, लेकिन अचानक उसने देखा कि कुछ लोग रेल (पटरी) के बीचों-बीच से जोर-जोर से कुछ आवाज़ दे रहे हैं। तब तक काफी देर हो चुकी थी। मांस और खून से लथपथ गोरखपुर एक्सप्रेस का इंजन धीरे-धीरे स्टेशन की ओर बढ़ता चला जा रहा था।

गैस के कोहरे को चीरती हुई लोकोमोटिव हेडलाइट को देखकर उप-स्टेशन मास्टर बी.के. शर्मा चौंक पड़े। उनको लगा कि उनके आदमी गिर गए हैं। ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म संख्या 1 पर बढ़ती आ रही थी। फिर भी दुर्घटना रोकने का अंतिम उपाय बचा था।

भारत के बड़े स्टेशनों की तरह भोपाल स्टेशन पर भी सूचना प्रणाली सुसज्जित थी। बी.के. शर्मा ने सब्र की सारी सीमाएं तोड़ते हुए कार्यालय के बिल्कुल अंतिम छोर पर स्थित इस प्रणाली को चालू कर और माइक्रोफोन अपने हाथ में ले, पूरी तसल्ली और पेशेवर अंदाज़ में हिंदी में बोलना शुरु किया… “सावधान! सावधान! सावधान! किसी खतरनाक रासायनिक पदार्थ का रिसाव होने के कारण हम भोपाल उतरने वाले सभी यात्रियों से अनुरोध करते हैं कि वे अपने डिब्बों में ही रहें। ट्रेन तत्काल यहां से चली जाएगी। यात्रीगण अगले स्टेशन पर उतर सकते हैं”  उन्होंने इस सूचना को उर्दू में भी दोहराया।

अब अपने मुंह पर गीला तौलिया रख, शर्मा ट्रेन के इंजन की तरफ दौड़े और इंजन चालक को आदेश दिया कि वह स्टेशन छोड़ दे। शर्मा को मालूम था कि यह आदेश अवैध है, क्योंकि भोपाल एक महत्वपूर्ण स्टेशन था, जब गाड़ियां यहां रुकतीं तो उनकी यांत्रिक चेकिंग की जाती थी। लेकिन शर्मा ने अपनी पॉकेट से एक छोटे से झंडे को निकाला और इंजन केबिन की खिड़की पर लगा दिया और कहा कि “संकेत बिल्कुल साफ है, तुरंत निकल जाओ”

यही एक औपचारिक तरीका था। इंजन चालक ने अपना सिर हिलाया। ब्रेक हटाया और डीजल इंजन के रेगुलेटर पर जोर से दबाव डाला।
धीरे-धीरे गोरखपुर एक्सप्रेस इस मौत के महानगर से, जहां चारों ओर चीख पुकार की आवाजें फैली हुईं थीं, बाहर निकल गई। पसीने से तरबतर बड़ी मुश्किल से सांस लेते हुए बी.के. शर्मा भारी दिल के साथ, लेकिन अपनी उपलब्धि पर गौरव महसूस करते हुए, इस कब्रिस्तान को चीरते हुए, प्लेटफार्म के दूसरे किनारे पर अपने दफ्तर वापस लौट आए लेकिन अब भोपाल स्टेशन मास्टर के दफ्तर की पहचान मुश्किल हो गई थी।

साभार-Five past Midnight in Bhopal (हिंदी), मूल्य-150/- (2009 संस्करण), पेज-347, लेखक-डोमिनीक लापिएर और जेवियर मोरो , प्रकाशक-हिंद पॉकेट बुक्स

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