चुनाव: बहिष्कार से विकास की आस

__अमित (AmitBharteey)

अगर आपकी राजनीति में रुचि हैं और इससे संबंधित ठीक-ठाक सामग्री पढ़ते रहते हैं तो आपने कई विद्वानों को ये कहते पाया होगा कि गरीबों का, अंतिम-जन का सबसे आख़िरी और कारगर उपाय उसका अपना मत होता है। जब चुनी गईं सरकारें और प्रतिनिधि पाँच साल (या निर्धारित कार्यकाल) में उसकी अपेक्षाओं के अनुरुप कार्य नहीं करते तो आम व्यक्ति चुनाव के समय अपने मत की शक्ति से उन्हें सबक सिखाते हैं और सरकारों को गिरा देते हैं।

कुछ दिन पहले (और पहली बार) जब मेरा मिलना भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे एस. वाई. क़रैशी साहब से हुआ तो उन्होंने भी इसी बात को कुछ यूँ कहा था कि गरीब व्यक्ति चाहता है कि चुनाव बार-बार आएं क्योंकि चुनावों के समय ही वोट मांगने के लिए नेता बार-बार उसके सामने आते हैं और हाथ जोड़कर सर झुकाते हैं। इससे गरीब मतदाताओं को लोकतंत्र में अपनी शक्ति का एहसास होता है।

लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता। चुनाव आते हैं और इसके साथ ही ये ख़बरें भी कि फलां गाँव, गाँवों के समूह या किसी क़स्बे ने मतदान न करके, चुनाव बहिष्कार का निर्णय लिया है। हालांकि ऐसा करने वाले कम होते हैं (इसका मतलब यह कतई नहीं कि सब कुछ ठीक है) लेकिन फिर भी ऐसा होता जरूर है।

ऐसा ही इस बार हो रहा है बुंदेलखण्ड में पड़ने वाले जनपद जालौन के गाँव मड़ोरी में… विकास खण्ड-माधौगढ़, तहसील-जालौन, विधानसभा-कालपी, जनपद से 13 किमी दूर और जनपद मुख्यालय से 34 किमी दूर।

ये कोई ऐसा गाँव नहीं है जो चुने हुए जनप्रतिनिधि या जनपद की प्रशासनिक मशीनरी की पहुँच से दूर हो। जालौन-औरया मार्ग से नीचे उतरकर बस आपको करीब तीन किलोमीटर चलना होगा कि आप इस गाँव में पहुँच जाएंगे लेकिन रुकिए… इसी तीन किलोमीटर में अगर आपने जरा सी चूक तो आप गाँव बाद में पहुँचगें. अस्पताल पहले जाना पड़ेगा। रोड पूरी तरह न सिर्फ उखड़ा है बल्कि उसका भूगोल कुछ यूँ बिगड़ा है कि बाइक इस तीन किलोमीटर को पार करने में आपको 20-25 मिनट लग जाते हैं।

इसी दुर्दशा को लेकर यहाँ के ग्रामीणों में रोष है। विधायक (वर्तमान में यहाँ कांग्रेस से विधायक हैं)  से लेकर सांसद (वर्तमान में भाजपा के सांसद हैं), एसडीएम से लेकर डीएम तक आए लेकिन सिर्फ शब्दों के साथ… “चिंता मत कीजिए, हम जल्दी इस रोड का कुछ करवाते हैं”

जब ये सुनते-2 अति हो गई तो ग्रामीणों ने इस बार चुनाव वहिष्कार का निर्णय लिया। मुझे जब इस बारे में मेरे एक मित्र (इत्तेफाक़ से वो इसी गाँव के मूल निवासी भी हैं लेकिन अब गाँव में नहीं रहते) से पता चला तो जिज्ञासावश जा पहुँचा। इसे महज़ एक इत्तेफाक़ ही कहा जाएगा कि जब मैंने गाँव में जाकर हाल-चाल लेने का फैसला किया तो ठीक उससे पहले मेरे हाथ में एक ख़बर थी… अगर आप मतदान नहीं करते तो आपको सरकार को दोष देने का कोई हक़ नहींः सर्वोच्च न्यायालय  सर्वोच्च न्यायालय के इस ताज़ी टिप्पणी ने अपने उन शब्दों की याद अनायास दिला दी जब नोटा का फैसला देते हुए माननीय न्यायालय ने कहा था कि नोटा के बाद मतदान ने विरक्त रहने का कोई कारण नहीं बचता। मतलब, मतदान हर हाल में करना है। न सही किसी उम्मीदवार को तो नोटा ही सही…

इन्हीं शब्दों को लेकर जब गाँव पहुँचा तो बहिष्कार के निर्णय को लेकर अद्भुत एकता देखने को मिली। करीब 20-25 लोगों से बात की होगी, सबने कहा कि इस बार बहिष्कार होगा। ग्राम सरपंच चंद्रभान सिंह से भी बात की… वे तो यहाँ तक कहते है कि उन्होंने सचिव-बीडीओ से कहा कि अगर आप गाँव की समस्याएं हल नहीं कर सकते तो संभव हो तो उनके गाँव को सरकारकर (खिसकाकर) यमुना में प्रवाहित करा दो! ग्राम प्रधान के अनुसार नौकरशाही और बाबूगीरी लोकतंत्र को पनपने नहीं दे रही हैं।

बस दो लोग ऐसे मिले जो इस निर्णय से सहमत नहीं हैं। उनमें एक हैं भूतपूर्व प्रधान, लखपत सिंह हैं। इनके अनुसार बहिष्कार से आजतक किसी गाँव का भला नहीं हुआ। बहिष्कार की ख़बरे बस कुछ दिन पेपर में आती हैं, जिसे पढ़कर प्रशासन दौड़ लगाता है और माने तो ठीक न माने तो ठीक… चुनाव ख़त्म, बहिष्कार ख़त्म… कोई नहीं सुनता। लेकिन फिर भी वो जोड़ते हैं कि चूँकि गाँव वालों ने सर्वसम्मत्ति से फैसला किया तो वो भी वहिष्कार के फैसले को मानेगें।

बीच-बीच में, मैं “काम बोलता है” भी पूछता गया तो सबका एक ही जवाब होता-आप जिस रोड से आए हैं वहाँ काम बोल रहा है? इस गाँव में किसी को भी लोहिया आवास योजना का लाभ नहीं मिला। जरुरतमंद लोग ‘भुगतान’ करने को भी तैयार हैं लेकिन कुछ नहीं।

ऊपर से स्वस्छता अभियान को इतना शोर है। सदी के महानायक टीवी पर खुले में शौच न करने का संदेश दे रहे हैं लेकिन अगर शौचालय हों ही न तो क्या किया जा सकता है? पिछले करीब डेढ़ साल से इस गाँव को केवल पाँच शौचलय मिले हैं, वे भी इंदिरा आवास योजना के अंतर्गत। इसके अतिरिक्त अगर कोई सक्षम नहीं है तो वो क्या खुले में शौच न जाए? तो कहाँ जाए?

सफाई कर्मियों की समस्या हर गाँव में एक जैसी है। ये मेरा सामना पांचवे या छठे ऐसे गाँव (इसमें मेरा गाँव भी शामिल है) या ग्राम प्रधान से था जहाँ कागजों में सफाई कर्मी नियुक्त हैं, हर महीने वेतन लेते हैं लेकिन औसतन महीनें में 4-5 दिन आते हैं, कहीं-कहीं तो पूरा का पूरा महीना गोल हो जाता। ऐसे में बिना ग्राम प्रधान की सहमति से वेतन कैसे निकल पाता है? इसका कोई सीधा न तो जवाब मिला तो न ही वेतन निकालने की प्रक्रिया की सही जानकारी।

दूसरे व्यक्ति, जिन्होंने बहिष्कार के फैसले से असहमति जताई वो हालांकि इस गाँव के रहने वाले नहीं हैं लेकिन गाँव के विद्यालय में शिक्षक होने के कारण यहाँ आते हैं। असमति के पीछे बिल्कुल वही कारण जो भूतपूर्व प्रधान के थे… कि बहिष्कार से आजतक किसी गाँव का भला नहीं हुआ।

मैंने जब गाँव वालों से सर्वोच्च न्यायालाय की टिप्पणियों की चर्चा की तो गाँव के ही एक युवा जनमेजय सिंह के अनुसार, गाँव में बहुत तो ऐसे वृद्ध हैं जो नोटा के बारे में कतई नहीं जानते या कम दिखाई देने के कारण नोटा की जगह किसी दूसरे बटन को भी दबा सकते हैं तो ऐसे में 100 फीसद के लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सकता।

गाँव के ही एक अन्य पूर्व प्रधान की मानी जाए तो तो पिछले आठ महीने से सड़क बनाने के लिए करीब 17 लाख की रकम अटकी पड़ी है। अब इससे काम क्यों नहीं हो रहा, इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है।

अब जब मैं ये लिख रहा हूँ तो पता चला कि गाँव वालों के बहिष्कार की ये सुगबाहट शायद प्रशासन तक जा पहुँची है और सड़क पर खुदाई का कुछ काम शुरु हुआ है।

कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती।

किसी का काम बोलता है तो किसी की दीवारें… जैसे इस गाँव की दीवारें बोल रही हैं। मड़ोरी ग्राम पंचायत में एक छोटा सा गाँव और लगता है… रैपुरा। वैसे तो ये गाँव बहुत छोटा है कि इसे आम बोलचाल में गाँव न कहकर ‘पुरवा’ कहा जाता है जिसमें करीब 25-30 घर होंगे लेकिन इसका मततब यह कतई नहीं कि आज़ादी की सत्तरवीं मध्य रात्रि तक, जब पूरी दुनिया रोशनी में जगमगा रही होगी उस समय भी इस पुरवा के लोग अन्य रातों जैसे उस रात को भी अंधेरे में ही गुजार दें। अगर एव्री वोट मैटर्स  तो एव्री सिटीजन ऑर एव्री विलेज़ मैटर्स  क्यों नहीं?
सुना है कि केंद्र की सरकार में बैठे कुछ मंत्री ट्विटर या फेसबुक जैसे आधुनिक मीडिया से भी ख़बरों को संज्ञान में ले लेते हैं। मुझे नहीं पता इस गाँव को पियूष गोयल जी कितने दिनों में संज्ञान में लेगे और कब यहाँ भी विकास का लट्टू जल उठेगा।

वैसे एक बात और गौर करने लायक है कि बिजली इस गाँव से महज़ बिजली के चार-पाँच पोल की दूरी तक (सिंचाई के लिए) किसी के खेत तक आ चुकी है। तो दूरी बिजली की पहुँच में नहीं बल्कि प्रशासन और सरकार के इरादों में है।

इसके अलावा यहाँ एक और समस्या है। सड़क। दरअसल, सड़क है ही नहीं… मतलब, तीन मूलभूत चीजों जिनको हम BiPaSa यानि बिजली-पानी-सड़क कहते हैं, उनमें से दो नहीं हैं। 5-10 मिनट की बारिश में अगर किसी को अस्पताल ले जाना पड़े तो करीब एक किलोमीटर तक उस पीड़ित के घर वाले उसे चारपाई पर रखकर ले जाते हैं। आपातकालीन परिस्थिति में इस स्थिति की कल्पना कीजिए।

पता नहीं सड़क मरम्मत या उसके निर्माण की बात को लेकर प्रशासन कितना सजग हुआ है लेकिन इतना पक्का है कि जैसे-जैसे चुनाव की तारीख़ नज़दीक आएगी, वैसे-वैसे प्रशासन इन्हें मनाने के लिए हर तरह के जतन करेगा। लेकिन क्या दशकों के पुर्निर्माण की राह देख रही इस मड़ोरी की इस सड़क या साथ में लगने वाले रैपुरा में सड़क बन पाएगी या वहाँ के निवासी बिजली का बल्ब जलते हुए देख पाएंगे? इसी दौरान किसी ने कहा कि वोट डालते-डालते तो 25-30 साल हो गए, न सड़क आई न बिजली, अब एक बार न डालें तो क्या फर्क पड़ता है, यही देख देख लेते हैं।

पश्च लेख: करीब 1900 मतदाताओं वाले इस गाँव से चलते-चलते जब मैंने नोटबंदी के बारे में पूछा तो पता चला कि उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। खेती के काम में कोई थोड़ी-बहुत जरुरत पड़ी तो एक दूसरे से मांग कर काम चला लिया। यहाँ तक उस समय गाँव में कुछ शादियां भी थीं लेकिन सब कुछ बड़ी आसानी से मैनेज हो गया। बात कर ही रहे कि बीच में किसी ने कहा कि परेशानी धन्नासेठों को हुई। किसानों-मजदूरों को क्या परेशानी होगी, जब बदलवाने के लिए ‘माल’ था ही नहीं।

1 Comment


  1. // Reply

    बहिष्कार से नही वोट करके एक विकासवादी sarkar chunne se hoga vikas

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