अलेप्पो से आए ‘आख़िरी संदेश’ जो कभी ‘आख़िरी’ थे ही नहीं

– अमन गुप्ता (@amanalbelaa)

इन दिनों सीरिया के शहर अलेप्पो की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। सरकारी सेना और विद्रोहियों के बीच आम नागरिक की जिंदगी ख़तरे में हैं। भारी बमबारी में बड़ी बड़ी इमारतें जमींदोज़ हो गईं। लाखों लोग मर रहे हैं। हर तरफ चीख पुकार है और लाशों का ढेर लगा हुआ है। आज आप कोई भी अख़बार कोई भी न्यूज़ वेबसाइट्स देख लीजिए सभी अलेप्पो की ख़बरों को प्रमुखता से दे कवर कर रहे हैं। टीवी चैनलों पर दिखाई देने वाले दृश्य आपको भीतर तक झकझोर कर रख देने वाले हैं। कहा जा रहा है कि सीरियाई सेना कत्लेआम करने में मासूम बच्चों और महिलाओं को भी नहीं बख़्श रही है।

इस नरसंहार के बीच सोशल मीडिया पर कई लोगों के ‘अंतिम’ वीडियो संदेश आ रहे हैं जिनमें वे कह रहे हैं कि हो सकता है ये उनका लास्ट मैसेज हो। यहाँ तक तो ठीक था लेकिन अगले ही पल वे कई मीडिया चैनल्स के प्राइम टाइम का हिस्सा बन जाते हैं। उनके इंटरव्यू हो रहे हैं।

हाल ही में कार्यकर्ता लीना ने ट्वीटर पर 40 सेकेंड का एक वीडियो पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने दुनिया से अलेप्पो और मानवता को बचाने की गुहार लगाई।

अपने वीडियो संदेश में लीना ने कहा, “हर कोई जो मुझे सुन सकता हो। घेराबंदी में फंसे अलेप्पो में नरसंहार हो रहा है। ये मेरा अंतिम वीडियो हो सकता है। तानाशाह असद के ख़िलाफ़ विद्रोह करने वाले 50 हज़ार से अधिक लोगों पर नरसंहार का ख़तरा है। लोग बमबारी में मारे जा रहे हैं। हम जिस इलाक़े में फंसे है, ये दो वर्गमील से भी छोटा है। यहाँ गिरता हर बम एक नरसंहार है। अलेप्पो को बचाओ, इंसानियत को बचाओ”

वहीं कार्यकर्ता अलहम्दो अपने एक वीडियो में कहते दिख रहे हैं कि “संयुक्त राष्ट्र संघ में विश्वास मत कीजिए किसी भी अंतर्राष्ट्रीय संगठन में भरोसा मत कीजिए। यह इतिहास में बहुत ही भयावह है। वे (सेना) और असद नहीं चाहते कि हम जिंदा रहें। वे हमारी लाशों पर जश्न मनाते हैं“

इसके अलावा एक बच्ची भी है जिसका नाम है ‘नाबा’। ट्विटर और बाकी सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स पर बहुत एक्टिव है। पूर्वी अलेप्पो की रहने वाली ये लड़की फर्राटेदार अंग्रेजी में ट्वीट करती है। ट्विटर पर उसके 2.5 लाख से ज्यादा फॉलोअर हैं। ट्विटर पर उसका वैरीफाइड अकाउंट है जिसमें लिखा है कि अकाउंट उसकी मम्मी के द्वारा भी ऑपरेट किया जाता है। इसमें उन्होंने एक फाइनल मैसेज में लिखा “मैं बहुत दु:खी हूँ। इस दुनिया में कोई उनकी मदद नहीं कर रहा है। कोई भी मुझे और मेरी बेटी को नहीं निकाल रहा है। अलविदा”

जब मैंने इन सब के अकाउंट्स की पड़ताल की तो एक बात सामने आई कि इन सभी ने बीते सितंबर या अक्टूबर महीने में ही ट्विटर पर अपना अकाउंट बनाया है। इसके अलावा हजारों की संख्या में इनके फॉलोअर है। इस दहशत भरे माहौल में एक तरफ जहाँ लोगों की सांसे अटकी हुई हैं। पल भर का भरोसा नहीं है। वीडियोज़ में पीछे बम गिरने की आवाज़ें सुनाई दे रही हैं। वहीं अगले ही पल ये लोग BBC, CNN और अल-जजीरा पर वीडियो इंटरव्यू देते दिख रहे हैं। क्या इस हालात में भी वहाँ इंटरनेट सेवा इतनी दुरुस्त है? BBC, जो अपनी हर ख़बर को प्रकाशित करने से पहले उसे दो या दो से अधिक स्रोतों से जांचने का दावा करता है, क्या उसे ये पहलू नहीं दिखाई दिया?  निसंदेह वहाँ हालात ख़राब हैं लेकिन क्या इसका दूसरा पहलू ये भी नहीं हो सकता है? जो मेनस्ट्रीम मीडिया नहीं दिखाना चाहता। मुझे लगता है इससे लोगों के दिमाग पर जो एक अलेप्पो की तस्वीर बनी है और साफ हो सकती है।

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