चर्चा के चबूतरे पर अन्ना हजारे

अन्ना जी आपके जीवन पर अब एक पूरी फिल्म आ चुकी है. कभी आपने (संघर्ष के आरंभिक दिनों में) सोचा था कि आपका जीवन एक दिन इतना महत्वपूर्ण और दूसरों के लिए प्रेरणादायी हो जाएगा जो पूरी फिल्म बन जाए?

नहीं मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरे जीवन पर फिल्म बनेगी. एक तो पहले से मेरा जीवन गरीबी में बीता. स्वामी विवेकानंद की किताब पढ़कर समाज सेवा की प्रेरणा मिली. इसलिए मैंने सोचा कि शादी नहीं करनी. अगर शादी कर ली तो पूरा जीवन चूल्हा जलाने में बीत जाएगा. अभी मुझे मेरे बैंक अकाउंट की किताब तक का पता नहीं रहता. मंदिर में सोने का बिस्तर है एक खाने की एक प्लेट है ऐसे में कभी नहीं सोचा था कि फिल्म भी बन जाएगी एक दिन. वो तो रवींद्र जैन के भाई हैं मनींद्र जैन वे एक दिन यहां आए और जब उन्होंने यहां आकर देखा तो उन्हें लगा कि ये एक प्रेरणादायी काम है और इसे दुनिया के सामने जाना चाहिए तो उन्होंने इस पर फिल्म बनाने की सोची.

आपके ऊपर बनी फिल्म को देखने पर पता चलता है कि आपका जीवन स्वामी विवेकानंद जी के विचारों से काफी प्रभावित रहा है. आप इस बात को लेकर भारतीय युवाओं को क्या संदेश देना चाहेंगे?

स्वामी विवेकानंद का जीवन मुझे पूरा समझ में नहीं आया. उनके जीवन की जो गहराई है, उसका कोई ठिकाना नहीं है. लेकिन फिर भी जो एक बात मुझे लगी वो ‘जीवन क्या है?’ हर कोई मेरा-मेरा के चक्र में फंसा हुआ हैं. ऐसी प्रवृत्ति बढ़ती जा रही थी. सेवा करनी है तो चार दीवारों के भीतर एक मूर्ति होती है, ऐसे ही गाँव-देश आपका मंदिर है. उसके मानवों की सेवा ही सर्वोत्तम सेवा है. यही बात मुझे सबसे ज्यादा समझ आई.

विवेकानंद को सिर्फ पढ़ना ही पर्याप्त नहीं. जो पढ़ता है, उनमें बचपन के संस्कार होना भी जरूरी. मेरी माँ ने जो अच्छे संस्कार दिए ये उन्हीं की वजह से है कि स्वामी जी के विचारों को मैं आत्मसात कर सका. आजकल जो विवेकानंद को पढ़ते हैं लेकिन मानते नहीं, वे सब इसी कारण से हैं. और ये संस्कार ‘संस्कार केंद्र’ में बच्चे को भर्ती करने से नहीं आते, हर घर को, परिवार को संस्कार केंद्र बनना पड़ता है.

आपने देश सेवा को सर्वोपरि रखते हुए शादी न करने का फैसला किया… क्या आपको लगता है देश सेवा करने में विवाह बाधक है? और इसे भावी पीढ़ी को किस परिपेक्ष्य में लेना चाहिए?

मैं ऐसा नहीं मानता हूँ. जो भी युवा मेरे पास आते हैं, मैं उनसे कहता हूँ कि मैंने शादी नहीं की तो इसका मतलब ये नहीं आप भी शादी न करें. ये संदेश आपके लिए नहीं है. बैचलर रहकर काम करना आसान नहीं है. शादी करो पर अपने परिवार के साथ निष्काम भाव से समाज की सेवा के लिए भी वक्त निकालना चाहिए.

आपके ऊपर बनी फिल्म में दिखाया गया है, कई अवसरों पर हमलों के दौरान आप आश्चर्यजनक तरीके से सुरक्षित बचे, क्या आप अपने ऊपर किसी अदृश्य शक्ति की कृपा महसूस करते हैं जो आपको हर अच्छे कार्य को करने में प्रेरणा प्रदान करती है?

अदृश्य शक्ति की कृपा तो होती है लेकिन सब बातें कृपा से नहीं होतीं. पहले तो अपने चरित्र को बनाना पड़ता है, निष्काम भाव से काम करना पड़ता है. इसके बाद एक शक्ति है इस दुनिया में… जैसे कोई चित्रकार चित्र बनाता है तो उसके पीछे एक शक्ति काम करती है. इसी प्रकार इस दुनिया में भी एक शक्ति है. समुद्र कभी अपनी सीमा नहीं बदलता… इसको कोई न कोई नियंत्रित कर रहा है. इसी प्रकार मैं कह सकता हूं कि कई बार मैं मौत के मुंह में आया लेकिन कुछ ऐसा हुआ जो मैं बच गया… 65 की लड़ाई में मुझे कई गोली लगीं लेकिन मैं बच गया, तो ये कहीं न कहीं शक्ति का असर है.

आपने लोकपाल के लिए पूरे देश को जगा दिया,उसकी रगों में नई स्फूर्ति का संचार कर दिया. लेकिन आख़िर उस लोकपाल के सपने का क्या हुआ? सत्ता पक्ष तकनीकि कारणों से विपक्ष का  रोना रोता है तो विपक्ष को मानो कोई मतलब ही न रह गया हो.. और सबसे निराशाजनक कि आम जनता इसे भूल चुकी है.

जनता भूली नहीं है. दरअसल, लोग कुछ कर नहीं पाते. परिवार की जिम्मेदारियां हैं. वे पहले नहीं आते लेकिन कोई नेतृत्व दे तो जनता जरूर आएगी. जैसे रामलीला मैदान में हुआ था. जब उनको लगा ये जरूरी है तो वे आगे आए थे. अब हम इसे फिर से पुनर्जीवित करने की दिशा में बढ़ रहे हैं. फिर से एक बार रामलीला मैदान में.

क्या आपकी अगली मुहिम में फिर से आपको किन्हीं नायकों की जरूरत पड़ेगी जैसे पिछली बार पड़ी थी 2011 के दौरान ?

नहीं, जनता में नायक बहुत हैं जो अनायक बनकर काम करते हैं. ये पहले भी आए हैं और आगे भी आएंगे.

अभी आपने भ्रष्टाचार के लिए कई आंदोलन किये लेकिन उनकी आवाज धीमी पड़ गई. स्वराज की बात की जाए तो निचले स्तर पर जिला पंचायत और जिला सदस्य के चुनाव खूब भ्रष्टाचार होता है, अब स्वराज की बात किए जाने पर इसका क्या हल है?

स्वराज इस देश में आएगा… उसमें समय लगेगा. आज अगर देश में भ्रष्टाचार है तो इसका कारण है कि संविधान को छोड़कर राजनीति हो रही है. ये मैं खुल के कह रहा हूँ. संविधान में कहाँ है पक्ष और पार्टी? संविधान में 25 और 30 साल के ‘व्यक्ति’ संसद में चुने जा सकते हैं लेकिन ये तभी से ‘समूह’ हो गया. पहले चुनाव से ही चुनाव आयोग को एक्शन लेना चाहिए था लेकिन ऐसा हुआ नहीं. 1952 से जो चुनाव हो रहे हैं वे संविधान विरोधी हैं.

बाबा रामदेव आप लोगों के साथ ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ की मुहिम में थे. आज के दौर में वे योग के साथ – साथ स्वदेशी की मुहिम में पतंजलि के उत्पादों को जन-जन तक पहुंचा दिया है. आपका क्या कहना है ?

स्वदेशी ठीक है. इसका हमारे गांवों में उत्पादन होगा हमारे लोगों को रोजगार मिलेगा. दूसरा, ये विदेशी कंपनियों अपने उत्पादों में क्या मिलाते हैं…पता नहीं. और अंत में विदेशी मुद्रा भी बचेगी. इसीलिए ये स्वदेशी की सोच ठीक है. हर किसी को अपने देश की भलाई के लिए स्वदेशी अपनाना चाहिए.

अगर भविष्य में केंद्र सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं तो क्या आप उसके खिलाफ मुहिम निकालकर जनता के बीच जाएंगे ?

हां बिलकुल, सरकार कौन है, ये मैं नहीं देखता. पक्ष-पार्टी मेरे लिए कुछ नहीं. मैंने व्रत लिया है जब तक जियूंगा… गाँव, देश और समाज की सेवा करूंगा. मरूंगा भी सेवा के लिए… इसलिए पार्टी कौन सी है ये मायने नहीं रखता… अगर वो समाज-देश के लिए घातक है तो मैं लड़ूंगा

भारत सरकार की पाकिस्तान को लेकर आक्रामक नीति से क्या आप सहमत हैं ? आप भारतीय सेना में रह चुके हैं. भारतीय सेना के पराक्रम पर आप क्या कहेंगे ?

हमारी सेना में पहले से ही जोश है. चीन के युद्ध के समय हमारी सेना के पास कितने संसाधन नहीं थे. लेकिन बाद के समय 1965 में हमारी सेना के पास सारे संसाधन थे तो हमने करके दिखा दिया. कहने का मतलब है कि अगर सेना के पास पर्याप्त संसाधन हो तो हमारी सेना बहुत बहादुर है.

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1965 में पाकिस्तान के युद्ध समय आपके सिर पर चोट आ गई थी इसके बारे में विस्तार से बताइये?

1965 पाकिस्तान के साथ युद्ध में खेमकरण सेक्टर में हमारा काम सेना को हथियार और अन्य जरूरी सामान सप्लाई करना था. दुश्मन युद्ध में उन्हीं यूनिटों को सबसे पहले निशाना बनाते हैं जो रसद एवं अन्य जरूरी सामान की सप्लाई करती हैं. हमने देखा कि कुछ हवाई जहाज बहुत नीचे उड़ान भर रहे हैं पहले तो हमें लगा कि शायद हमारे हवाई जहाज होंगे क्योंकि यह काफी नीचे उड़ान बनाते हैं लेकिन फिर उन हवाई जहाजों ने हम पर बमबारी शुरू कर दी तो मैं बचते-बचाते ट्रक को आगे ले गया और ट्रक आगे एक बिजली के पोल से टकरा गया बिजली के पोल से टकरा गया तो मैं किसी तरह बाहर निकला और काफी देर तक में मरणासन्न स्थिति में पड़ा है जिससे दुश्मनों को लगे कि मैं मर गया हूं लेकिन उन पाकिस्तानी प्लेनों ने बमबारी जारी रखी. इस दौरान हमारे कई साथी घायल हुए, कई साथी शहीद हो गए और मुझे ये सिर में चोट आ गई थी.

सीमा पर जिस तरह के इस समय हालात हैं ऐसे में आपको नहीं लगता कि एक बार आर पार की लड़ाई हो जानी चाहिए?

वर्तमान दौर में लड़ाई दोनों देशों के लिए ठीक नहीं है हम दोनों देशों की स्थिति अच्छी नहीं है पाकिस्तान पर भी कर्जा है और हमारे देश पर भी कर जाए लड़ाई बिल्कुल ठीक नहीं है दोनों पड़ोसी देश है पड़ोसी धर्म का दोनों को पालन करना चाहिए. लेकिन जैसा आजकल माहौल है उससे लगता है कि पड़ोसी धर्म का पालन नहीं हो रहा तो आर-पार की लड़ाई के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता.

इस उम्र में मैं भले ही दौड़ना नहीं जानता हूं लेकिन मुझे यह पता है कि ग्रेनेड कैसे फेंका जाता है, एलएनजी (बंदूक) कैसे चलाई जाती है इसलिए अगर कभी जरुरत पड़ी तो मैं पीछे नहीं हटूंगा, मैं अभी भी लड़ सकता हूँ.

मौजूदा केंद्र सरकार की नीतियों से सेना को कितना बल मिलता है इस पर आपकी क्या राय है?

बल तो मिलता है लेकिन उसे हमेशा के लिए कायम रखना बहुत जरूरी है. अभी सीमा पर ये हालात है और यहां एक जवान पेंशन न मिलने के चलते आत्महत्या कर लेता है ऐसा नहीं होनै चाहिए. लोकसभा में बैठे लोग कितना काम करते हैं, क्या काम करते हैं? संसद के अधिवेशन चर्चा करने के लिए होते हैं और पूरा का पूरा अधिवेशन लड़ाई झगड़े में खत्म हो जाता है लेकिन जो चर्चा होनी चाहिए वह चर्चा नहीं हो पाती है. संसद में बैठे लोगों को जब अपना वेतन बढ़ाने की बात आती है तो तुरंत बना लिया जाता है. लेकिन जो बर्फ में खड़े हैं,  जो बरसात में खड़े हैं जो रेगिस्तान की तपती गर्मी में खड़े हैं… उनके लिए समय नहीं है. इन (नेताओं) को आठ-दस दिन सियाचिन में खड़ा करो… फिर पता चलेगा इनको.

हाल में भोपाल में जेल तोड़कर भागे हुए सिमी के 8 आतंकवादियों के एनकाउंटर पर आपका क्या कहना है ? कांग्रेस समेत कुछ राजनीतिक पार्टियां इस एनकाउंटर के फर्जी होने का सवाल उठा रही हैं, आप इस विषय मे क्या कहेंगे?

ये राजनैतिक मसला है मैं उसमें नहीं जाना चाहता. मुझे इस विषय में कोई सटीक जानकारी नहीं है इसलिए कोई टिप्पणी नहीं करूंगा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नरेंद्र मोदी के दिल्ली के मुख्यमंत्री के बीच तुलनात्मक तरीके से देखा जाए तो कौन बेहतर है?

अभी दोनों लोगों को अपने अपने 5 साल पूरे करने हैं जब तक की पूरे नहीं हो जाते मैं कुछ नहीं बोलूंगा. आज मेरे लिए कुछ भी बताना संभव नहीं है.

रालेगण सिद्धि के विकास में बाहर से कोई मदद ली गई?

हम बाहर से कोई दान नहीं लेते. विनोवा (भावे) जी कहते थे की दान इंसान को नादान बनाता है इसीलिए हम किसी से कोई मदद नहीं लेते. हम जो करते हैं स्वयं करते हैं. हां सरकारी योजनाएं हमारी अपनी योजनाएं हैं, उनसे जो मिलेगा, वो हम ले लेंगे… अगर नहीं देंगे तो झगड़ा करके ले लेंगे.

सांसद आदर्श ग्राम जैसी योजनाएं कितनी जरूरी हैं? क्या इस तरह की योजनाओं जिनमें गांवों के विकास की बात पर जोर दिया गया है इनसे देश का विकास संभव है?

बहुत जरूरी है क्योंकि अगर देश को बनाना है तो गावों को पहले बनाना होगा. इसलिए जितने आदर्श गांव बन जाएं उतना अच्छा है. अगर हम आजादी के बाद से ही ये काम शुरु कर देते तो अगर आप रालेगण या हिवरे बाजार जैसे गांव बना देते तो आज क्या अमेरिका क्या रसिया!

क्या रालेगण सिद्धि गांव को आदर्श गांव के रूप में खड़ा किया जा सकता है?

सभी आदर्श गांव सिर्फ पैसे से नहीं बनते अगर पैसे से बनते होते तो कब की बन चुके होते हैं इसके लिए जरूरत है लीडरशिप की… मतलब शुद्ध आचार, शुद्ध विचार… निष्कलंक जीवन वाले लोगों की.  पैसे से होते हैं तो हमारे देश में अमीरों की कमी नहीं है कब का ऐसा हो चुका होता लेकिन मनुष्य का निर्माण पैसे से नहीं किया जा सकता. जब ऐसे लोग खड़े होंगे तब आदर्श गांव बनेगा. हमारे देश की आबादी सवा सौ करोड़ है जबकि हमारे गांव की संख्या 638000 हमें सिर्फ 638000 युवक चाहिए जो लीडरशिप दे सकते हैं. यही तो कलाम साहब का सपना था लेकिन दुर्भाग्यवश वह इसे पूरा होते हुए नहीं देख पाए.

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