प्रेम और उसका बदलता स्वरूप

प्रेम क्या है? इसके लक्षण क्या हैं? कैसे होता है? कैसे फैलता है? इन प्रश्नों के उत्तर खोजने और देने में ना जाने कितने चिन्तक, विचारक, दार्शनिक शहीद हो गए। लेकिन आजतक प्रेम, उसके लक्षण और गुणों का कोई परिष्कृत और परिभाषित अर्थ लोगों के सामने नहीं आया है। उसके बाद भी हम सभी हजारों-लाखो वर्षो से प्रेम करते और निभाते आ रहे हैं।
यदि हम इसका व्यापक अर्थ में लें तो प्रेम के कई रूप हैं। जैसे युगल-प्रेम, पिता-पुत्री-पुत्र प्रेम, माता-पुत्र-पुत्री प्रेम, भाई-बहन का प्रेम, पति-पत्नी का प्रेम, सगे सम्बन्धियों से प्रेम, यहाँ तक कि जानवरों से प्रेम भी होता है, भले ही अल्पकालीन ही क्यों ना हो।

अधिकतर लोग प्रेम को काफी छोटे रूप में लेते है। जैसे की युगलों का प्रेम। इस प्रेम में एक स्त्री का प्रेम एक पुरुष पर केंद्रित होता है और एक पुरुष का एक स्त्री पर। कथा-साहित्य, फिल्म, आदि सभी जगहों पर चर्चा और विवाद इसी पर होता है। वैसे भी युगल-प्रेम अपने आप में पीएचडी करने वाला विषय है और विदेशों में, खासकर अमेरिका और यूरोप में “लव एंड रिलेशनशिप” पर शोधकर्ता पीएचडी करते भी हैं। लेकिन इस लेख का विषय मात्र समय के अनुसार युगलों के प्रेम में आ रहे बदलाव पर ही केन्द्रित है।
आरंभ में प्रेम मन पर आधारित और केन्द्रित था। यदि दो लोगों (स्त्री-पुरुष) के मन मिल गए तो उनके बीच प्रेम हो जाता था। प्रेमी का अपने मन की बात को प्रेयसी के मन तक पहुंचाने की चेष्टा किया करता था। शायद कविता का जन्म भी इसी कारण और उद्देश्य से हुआ होगा। उस समय प्रेम संस्कारी था, क्योंकि विरह की आग में तपता था। बगावत कर सकता था। लेकिन सामान्यतः प्रेम के उदगार में सौम्यता ही देखी जाती थी। इसका कारण क्या था? यह बताना मुश्किल है। विद्वान इस पर एक मत नहीं हैं। फिर भी कइयों ने अंदाज़ा लगाया है कि पारिवारिक जिम्मेदारियों, मान-प्रतिष्ठा के प्रति सजगता, और कुछ अन्य सामाजिक कारणों के वश में आकर प्रेम का उद्गार मध्यम होता था। और जिनका प्रेम का उद्गार मध्यम ना रहा वो इतिहास बन गए या बना दिए गए।

उस समय प्लाटुनिक प्रेम बहुधा में देखने को मिलते थे। प्रेम में कामुकता तब भी थी, लेकिन अपने न्यूनतम स्तर पर। उस ज़माने में प्रेम सामान्य लोग शादी-विवाह के बाद ही किया करते थे। कहा जाय तो “लव-आफ्टर-मैरिज़” वाला सिद्धांत अधिक लोकप्रिय था।
लेकिन समय बीतने के साथ मन के भीतर का प्रेम, तन पर और उसकी भाव-भंगिमाओं पर भी आधारित होने लगा। रूप-रंग सदा से ही आकर्षण का केंद्र रहे है (और आज बहुत ज्यादा ही हो गए हैं)। आज भी अरेंज-मैरिज़ होती हैं लेकिन प्रेम शब्द और उसका मतलब लोग बहुत छोटे उम्र से जानते रहते हैं। आज जब सोशल मीडिया हर एक व्यक्ति को आपस में जोड़ जा रहा है, ऐसे समय में लोगों को सोशल मीडिया पर भी जाने-अनजाने लोगो से प्रेम हो जा रहा है। ऐसी बाते अक्सर सुनाने को मिलती रहती हैं।
वैसे भी आजकल प्रेम सम्बन्ध में अनेको नए शब्द आ गए हैं, जो उन संबंधो को परिभाषित करते है। जैसे वाइब्स, क्रश, ब्रेकअप, पैचअप, लिव-इन और ना जाने क्या-क्या… इस नए प्रेम में जो सबसे अजीब बात होती है वह है कि यह बहुत उतावला होता है। विरह की तड़प से उत्पन्न संस्कार ग्रहण करने की फुर्सत नहीं होती है। और इसका उद्गार भी अक्सर घर परिवार में अशांति का कारण बन जाता है।
आज का प्रेम बहुत खर्चीला भी है। वैसे इसका दोष आज की पीढ़ी को देना सही नहीं होगा। पुरातनकाल से ही प्रेमी एक दूसरे को उपहार दिया करते थे, आज यही परम्परा बड़े जोरों से चलन में है।
पहले के प्रेम और आज के प्रेम में अंतर पता करना हो, तो हमें प्रश्न अपने दादाजी से पूछना चाहिए… और पिताजी से भी… मान लीजिए कि आपने पूछा तो संभवतः उनका उत्तर होगा कि “मेरा विवाह बचपन में हुआ था और दादीजी 5-7 वर्षों बाद दुरंगामन (गौना) हो कर आई थीं। आने के बाद भी उन्होंने (दादीजी) ने लगभग साल भर तक बातचीत तक नहीं की थी” यही प्रश्न के बारे में पापा के पीढ़ी के लोग कहेंगे कि– “मेरी शादी के तीन वर्षों के बाद तुम्हारी माँ घर आई थी, हमने भी कई महीने तक एक दूसरे से बात तक नहीं की”
आज से एक पीढ़ी पहले तक में प्रेम शर्म के आवरण से ढाका होता था। क्या लड़का, क्या लड़की… सभी एक दूसरे से लजाते थे। यही लाज और शर्म उस प्रेम में बाधा और विविधता प्रदान करती थी। आज ऐसी बात अपवाद में होती जा रही है। यदि आज कोई लड़का या लड़की बहुत ज्यादा अंतर्मुखी ना हो, तो ऐसी बातें देखने को ना के बराबर ही मिलती हैं। प्लाटुनिक प्रेम (वासना-विहीन प्रेम) अब लगभग दुर्लभ वस्तु हो गयी है। आज की तकनीक ने लोगों को बहुत पास ला दिया है। प्रेम को संस्कारित करने वाला विरह ना जाने कहाँ खो गया है। लोग खुले आम प्रेम का प्रदर्शन पार्कों में, थियेटर आदि में करते है। लाज और शर्म जैसी बातें, अब लगभग रही नहीं। इसी कारण से प्रेमी-युगल कभी-कभी कुछ पुरातन विचार वाले लोगों के हत्थे चढ़ जाते हैं। और हत्याकांड जैसी चीजें भी देखने को मिलती हैं।
आज की सबसे विचित्र स्थिति यह देखने को मिलती है कि 10-12 वर्ष के बच्चे भी बॉय-फ्रेंड गर्ल-फ्रेंड बनाने और निभाने लगे हैं। छोटी उम्र का प्रेम और किशोरों का प्रेम अलग होता है। छोटी उम्र में प्रेम मासूम और किशोर अवस्था में प्रेम शारीरिक और मानसिक आकर्षण होता है। ऐसा अक्सर लोग मानते है और इन छोटे और किशोर बच्चो की पॉकेट-मनी का बहुत बड़ा हिस्सा चुपके से अपने उस विशेष फ्रेंड को गिफ्ट देने में चला जाता है, जिसे वह प्रेम करते हैं। उफ्फ… यह खर्चीला प्रेम!

क्या आज का प्रेम सही है और यह आदर्श स्थापित करेगा? यह बताना थोड़ा कठिन है। एक सभ्य समाज के अंदर प्रेम कोई गुनाह नहीं है। लोग अक्सर कहते है कि ‘समाज प्रेम का दुश्मन है’। लेकिन यदि प्रेम का व्यापक अर्थ को सामने ले तो ऐसा नहीं है। प्रेम समाज के लिए एक आवश्यक अंग है। प्रेम वह गोंद है, जो परिवार में एक सदस्य को दूसरे से जोड़ कर रखता है। एक परिवार को दूसरे से जोड़ कर रखता है। यहाँ तक कि पूरे समाज को जोड़कर रखने वाला भी प्रेम है। यदि समाज से प्रेम मिटा दिया जाए तो समाज की इकाई अर्थात परिवार नष्ट हो जाएंगे। और परिवार के नष्ट होते है पूरा का पूरा समाज स्वतः ख़त्म हो जाएगा। फिर भी प्रश्न उठता है कि समाज प्रेम का विरोध क्यों करता है? इसका सही उत्तर यह है कि समाज उसी प्रेम का विरोध करता है, जो उसकी मौजूदा मान्यताओं और परम्पराओं के खिलाफ जाता है। प्रेम के सामान्य परिणति विवाह है और इससे दो व्यक्ति विवाह करके समाज की इकाई के रूप में प्रवेश करते हैं। यदि विवाह सामाजिक परम्पराओं के अनुसार हो तो समाज खुले हाथों से आशीर्वाद देता है और स्वागत करता है। लेकिन मान्यताओं के टूटने पर समाज नाक-भौ सिकोड़ता है।
अधिकांश लोग यह सोचते है कि प्रेम एक प्रकार की भावना है। हो सकता है। लेकिन यही प्रेम जिम्मेदारियों में बदल जाता है। आज लोग जहाँ जिम्मेदारियों से भाग रहे हैं, वहीं उनका प्रेम उथला और वहीं तक सिमित होना चाहता है, जहाँ तक वह जिम्मेदारी में ना बदले।
जिम्मेदारी-विहीन प्रेम अधूरा होता है और वह कामुकता की ओर धकेलता है। फिर यह कामुकता बहुत सी अप्रत्याशित और अप्रिय समस्याओं को जन्म देती है।
प्रेम अपने आप में शुद्ध है, निर्मल है, निश्चल है, पवित्र और सकारात्मक उर्जा, भावना और शक्ति है। लेकिन यह अकेले में नहीं आता है। वह अपने साथ जिम्मेदारियों का पहाड़ लेकर आता है। यदि हम प्रेम के साथ जिम्मेदारियों को नहीं आत्मसात करते, तो हम फ्रॉयड के कामुकता के दैत्य को खुला छोड़ देते हैं, जो परिवार के प्रत्येक रिश्ते को कामुकता की नज़र से देखता हैं और उसी अनुसार व्यवहार करने के लिए उकसाता है।
भारतीय जीवन परम्परा में वासना-विहीन प्रेम को आदर्श मन गया है और वासना में अंधे-प्रेम को निकृष्ट। जीवन में प्रेम आवश्यक है, जीने के लिए… लेकिन साथ-साथ यह भी जरुरी है कि हम कामुकता (वासना) में अंधे ना होकर, अपनी जिम्मेदारियों की समझें और उसका भली-भांति निर्वहन करें।

(लेखक अनूप झा अर्थशास्त्र के छात्र हैं साथ ही राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं। व्यक्त विचार निजी हैं, चौपाल से कोई संबंध नहीं)

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