कांग्रेस की मौजूदा स्थिति और चुनौतियां

 

भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। भले ही आज वह अपने अस्तित्व के लिए नहीं लड़ रही है, लेकिन वह समय रहते नहीं संभलती है तो 2019 के आम चुनावों के बाद कांग्रेस पर अस्तित्व के संकट का सवाल ज़रूर खड़ा होगा ।

भारत जैसे विशाल देश में विपक्षी पार्टियों का इस प्रकार कमजोर होना और उनके अस्तित्व पर संकट आना प्रजातंत्र के लिए अच्छी बात नहीं है। आइये समझने की कोशिश करते है कि ऐसा क्या हुआ जो 1885 में स्थापित भारत की ‘ग्रैंड ओल्ड पार्टी’ की इतनी ख़राब स्थिति हो गई।

पहला कारण ये है कि आज़ादी के बाद से ही कांग्रेस पार्टी नेहरू-गांधी’ परिवार की चरण वंदना में इतना व्यस्त हो गयी कि उसने कभी यह सोचा ही नहीं कि उसकी अगली पीढ़ी के नेता कहाँ से आयेंगे? कांग्रेस ‘नेहरू-गांधी परिवार से इतर कुछ सोच ही नहीं सकी। इसका एक कारण कांग्रेस में व्याप्त भाई-भतीजावाद भी था (जो अभी भी है)। एक नेता के गुजर जाने के बाद उसकी पत्नी, पुत्र या फिर उनका ही कोई सगा नेता बनता था। यूथ कांग्रेस सिर्फ नाम की ही संस्था बनी रही, इसमें से वही नेता ऊंचे पदों पर पहुँच सके जिनके रिश्तेदार पहले से ही कांग्रेस में नेता थे। इनको छोड़कर यूथ कांग्रेस ने कभी भी कोई कद्दावर नेता कांग्रेस को नहीं दिया। क्योंकि वहां जो छात्र नेता होते थे उन्हें यह मालूम होता था कि वह कभी भी शीर्ष पर नहीं जा सकते है। यदि कुछ चाहिए तो कुछ ना करो सिर्फ शीर्ष नेताओं अथवा नेहरू गाँधी परिवार के नजदीकी व्यक्तियों की चरण वंदना करो। इसका परिणाम यह हुआ की भूतकाल में अच्छी तालीम (जमीनी नेतृत्व करने की शिक्षा) ना पाने के कारण मौजूदा दौर में अच्छे और कर्मठ नेताओं का आभाव कांग्रेस में साफ़ नज़र आता है |

दूसरा कारण लम्बे समय तक संगठन की अनदेखी है। किसी भी संस्था को चलाने के लिए नेतृत्व और संगठन की सख़्त आवश्यकता होती है। और संगठन के विकास पर ध्यान ना दिया जाए और जरुरत के अनुसार उसमे बदलाव न किये जाएं तो संगठन कमजोर हो जाता है। यही स्थिति कांग्रेस के साथ हुई। उन्होंने लम्बे समय तक संगठन पर ध्यान ही नहीं दिया, जिसका परिणाम यह हुआ कि संगठन लगातार कमजोर होता गया। आज जब हर तरफ कांग्रेस नेतृत्व कि बात चल रही है, और हर कोई कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर ध्यान लगाये हुए है, तब भी कांग्रेस पार्टी की रीढ़ यानि संगठन पर किसी का ध्यान नहीं जाता है। साल 2014 से 2017 तक कांग्रेस ने अपने हजारों कार्यकर्ताओं और नेताओं को अन्य पार्टियों के हाथों खोया है । भले ही किसी भी पार्टी का चेहरा उसका शीर्ष नेतृत्व होता है, लेकिन जमीनी स्तर पर वोट मांगना, प्रचार करना, पोलिंग बूथ मैनेज जैसे कई काम सामान्य कार्यकर्ता और स्थानीय नेता ही करते हैं। आज कांग्रेस को बड़ी संख्या में नए कार्यकर्ताओं को खुद से जोड़ने की नई कारगर पहल शुरू करनी होगी।

तीसरा कारण है शीर्ष नेतृत्व के नाम पर बनी असमंजस की स्थिति । सबको मालूम है कि वर्तमान में कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ही सोनिया गांधी के नाम पर सभी फैसले लेते हैं। और हार की जिम्मेदारी लेते वक़्त, इसे सामूहिक तौर पर वितरित कर दिया जाता है। उम्मीद की जा रही है कि इस साल के अंत में अथवा अगले साल की शुरुआत में ही राहुल गांधी औपचारिक तौर पर कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद संभाल लेंगे। लेकिन अध्यक्ष बनने के बाद भी राहुल गांधी की मुश्किलें कम नहीं होने वाली हैं। मौजूदा स्थिति में कांग्रेस के भीतर कई गुट बने हुए है। पहला गुट हाल ही में कांग्रेस से अलग हुए दिग्गज नेता शंकर सिंह वाघेला जैसे नेताओं का है, जो राहुल गांधी की राजनीतिक काबिलियत पर लगातार प्रश्न चिन्ह उठाते रहे। इसी साल हुए गुजरात राज्यसभा चुनाव में राहुल गांधी की इस गुट से मन-मुटाव सबके सामने आ गया था।

दूसरा गुट ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट जैसे युवा नेताओं का है जो राहुल गांधी के निकट और उन्हें अध्यक्ष बनाने के समर्थक। ये गुट जल्द से जल्द राहुल गांधी की ताजपोशी चाहता है, साथ ही साथ संगठन में बड़े पैमाने पर फेरबदल भी। इन फेरबदल का एक बिंदु यह भी है कि इसमें दूसरे गुट के और विरोधी लोग हासिए पर धकेल दिए जाएंगे। जब तक राहुल गाँधी की ताजपोशी नहीं होगी तब तक कांग्रेस का कैडर अपने शीर्ष नेताओं को लेकर असमंजस की स्थिति में रहेगा।

आखिर जब भी राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बनेंगे, उन्हें कांग्रेस पार्टी को लाइन पर लाने के लिए भागीरथ प्रयास करना होगा, तभी जा कर कांग्रेस का कायाकल्प संभव है।

और अंत में बात करते है 2019 के लोकसभा चुनाव के दंगल की। यदि कांग्रेस अपने नेतृत्व और संगठन की उलझनों को सुलझा भी लेती है, तो उसके सामने जो सबसे बड़ी चुनौती होगी वह है एक नए पोलिटिकल नैरेटिव खोजने की। 2014 में नरेन्द्र मोदी ने विकास और भ्रष्टाचार के मुद्दे को खूब भुनाया। राहुल गांधी के पास ये मौका नहीं है, और न ही कांग्रेस विचारधारा, सेकुलरिज्म और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर चुनाव जीत पाएगी। उसे स्लोगन, और नैरेटिव की जरुरत है। कांग्रेस वाले अक्सर यह इल्ज़ाम लगाते हैं कि भाजपा विकास की मार्केटिंग करके चुनाव जीता है। तो प्रश्न यह भी उठता है की कांग्रेस किसी अन्य मुद्दे की मार्केटिंग क्यों नहीं करती है?

चुनाव में जीत हार तो सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन सबसे जरुरी चीज है खुद की जरुरत और प्रासंगिकता बनाये रखना। यदि कांग्रेस अभी नहीं संभली तथा नेतृत्व और संगठन के मसलों को हल करने पर ध्यान नहीं दिया गया तो 2019 के आम चुनावों के बाद कांग्रेस को अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़नी पड़ेगी और वो भी उस समय जब वह उसके लिए एकदम तैयार नहीं होगी!

 

(लेखक अनूप झा अर्थशास्त्र  के छात्र हैं साथ ही राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं। व्यक्त विचार निजी हैं, चौपाल से कोई संबंध नहीं)

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