“जय और ज़िंदाबाद” के बीच का जेएनयू

जेएनयू में जारी राष्ट्रवादी और राष्ट्रद्रोही की बहस के बीच ऐसे भी हैं जिनकी आवाज़ सुनी जानी चाहिए

… एक बार फिर मेरा फ़ोन बज उठा, पिछले कुछ दिनों से, हर बार की तरह इस बार भी यह किसी शुभचिंतक का फ़ोन मेरा हाल-चाल पूछने को नहीं आया बल्कि सवाल वही था जो शायद यहाँ पढ़ रहे अधिकांश छात्रों से हाल में पूछा जा रहा है “क्या चल रहा है ये सब, ख़बर लगी कि आपके केम्पस में देशद्रोही रहते हैं?”JNU

आज “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” के नाम पर जिन लोगों ने (उन्हें गद्दार भी कहा जाए तो कम न होगा)  ने हमारे कन्धे का अनजाने में दुरुपयोग करके भारत की एकता-अखण्डता को ललकारा है, ना जाने किस-किस के दिमाग में हाल ही  में 9 फ़रवरी की भारत-विरोधी नारेबाजी के बाद भारत के सबसे मुखर-बुद्धिजीवी माने जाने वाले “जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय” के लिये ऐसे ही विचार पनपने लगे होंगे. किस स्तर पर इस विश्वविद्यालय की साख धूमिल हुई है उनके इन निंदनीय कार्यों से जिनमें “भारत के टुकडे होंगे हज़ार” जैसे नारे देशद्रोहियों के द्वारा लगाए गए. लेकिन उससे भी ज्यादा भर्त्सना योग्य है वे सब अवसरवादी जो अपनी ओछी मानसिकता और संकीर्ण छात्र राजनीति के नाम पर इस मुद्दे पर हाथ सेंक रहे हैं.

फिर भारत का यशवर्धन करने वाला ये विश्वविद्यालय मीडिया की नकारात्मक छवि बनाने की माहिर कला का शिकार हुआ. बीते दिनों हमारे विश्वविद्यालय को ऐसे दर्शाया गया जैसे ये शिक्षा केन्द्र ना होकर कोई नक्सली, आतंकी और देशविरोधी तत्वों का अड्डा हो.

क्या कुछ मुठ्ठीभर सिरफिरों या मूर्खों की इन हरकतों से 8000 से अधिक छात्रों को आंका जा सकता है? क्या यहाँ से शिक्षित-दीक्षित, देश को गौरवान्वित कराने वाले व्यक्ति को भी उसी दृष्टि से देखा जाए जिससे कि उन ‘कुछ’ को देखा जाना चाहिये जो उतारु ही हैं भारत को अवसान के पथ पर ले जाने को?JNU lib किसी को भी जेएनयू का लघुविश्व रुपी बहुसांस्कृतिक स्वरूप नहीं दिखाई देता. मीडिया ने, यहाँ हुये बवालों और उन पर राजनीति करने वालों पर तो खूब कैमरा और कलम दोनों चलाए लेकिन इस बीच किसा का ध्यान नहीं गया तो उन छात्रों पर जो लाइब्रेरी या कक्षाओं में फिर भी थे क्योंकि उनके बयान ना तो मसालेदार ख़बर तैयार होने देते ना ही संकीर्ण राजनीति को हवा देते. यहाँ हर रोज गरम भाषण होते हैं, चर्चाएँ होती हैं, ये परिसर अपनी प्रखर बुद्धिजीविता के लिये जाना जाता है. यदि छात्रों की सत्यता सुनी जाती तो गंभीरता से और अधिक स्पष्टता से मुद्दा हल किया जा सकता था. इस छीछालेदर में रही कसर सोशल मीडिया ने पूरी कर दी

मेरे जैसा हाल यहाँ तकरीबन हर उस छात्र का है जो अभी भी किताबों में भलाई तलाशता हुआ प्रतिदिन की भांति लाइब्रेरी या कक्षाओं में जा तो रहा है लेकिन घिरा हुआ है उन तमाम प्रश्नचिन्हों से और दिमाग में अभी भी घर या किसी शुभचिन्तक के बीते दिनों आए फोन की कहकही चल रही है जिसमें उसे भी भागीदार बनना पडा उस भाषण का “कि कहीं तुम भी तो नहीं सीख रहे ये सब?”

(लेखक अनुराग मिश्र,  जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के इतिहास अध्ययन केन्द्र में स्नातकोत्तर के छात्र हैं. यहाँ व्यक्त विचार उनके निजी हैं. ‘चौपाल’ का इनसे कोई लेना-देना नहीं है)

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