क्या नेताजी की मौत पर प्रणब मुखर्जी ने उनकी पत्नी को गुमराह किया?

अनुज धर (@AnujDhar)

पिछले महीने की 23 तारीख़ को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सार्वजनिक की गईं नेताजी से जुडी 100 फाइलें कुछ ऐसा ही कहती हैं.

नेताजी की मृत्यु से जुड़ी  सार्वजनिक की गई इन 100 फाइलें में एक ऐसा “अति गोपनीय मेमोरेण्डम” भी  है जो तत्कालीन विदेश मंत्री और वर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा लिखा गया था. इसके अनुसार विदेश मंत्री रहते हुए उन्होंने नेताजी की पत्नी को नेताजी की मृत्यु के बारे में गुमराह किया है.
इस दस्तावेज़ में प्रणब मुखर्जी द्वारा 1995 में गुप्त रूप से की गई जर्मनी यात्रा का जिक्र है. यह यात्रा नेताजी से जुड़े विवादों को खत्म करने के लिए की गयी थी. NetaJiletter1
 प्रणब ने अपनी यात्रा के दौरान नेता जी की मृत्यु के विवाद पर उनकी पत्नी एमिली शेंकल, बेटी अनीता फाफ और दामाद मार्टिन फाफ  के साथ की गई  भेंट का भी जिक्र किया है. इसमें उन्होंने नेताजी की अस्थियां जापान से भारत वापस लाकर इस विवाद को ख]त्म करने की बात की है. प्रणब मुखर्जी के अनुसार नेताजी की पत्नी और बेटी ने उनसे नेताजी के लिए एक स्मारक पर चर्चा की साथ ही इस बात पर भी चर्चा हुई कि जापान से लौटी उनकी अस्थियों का क्या किया जाएगा. उन्हें गंगा में प्रवाहित किया जाए या फिर कहीं और सम्मानपूर्वक सुरक्षित रखा जाए…
 वे आगे लिखते है कि नेताजी की अस्थियां  भारत लाने के मामले पर उनकी पत्नी और बेटी जल्द से जल्द कोई हल चाहती हैं.
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“प्रणब मुखर्जी के दावे वास्तविकता से मेल नहीं खाते”

प्रणब मुखर्जी द्वारा लिखे गए इस आधिकारिक पत्र में चीजें वास्तविकता से पूरी तरह भिन्न हैं.  अगर नेता जी के परिवार के कुछ सदस्यों को छोड़ दें (जिनका कांग्रेस से संबंध है), तो बाकि हर सदस्य का यही कहना है कि (जिनमें उनकी पत्नी भी शामिल हैं) उन्होनें 1945 में हुई हवाई दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु पर कभी विश्वास नहीं किया. न उन्हें जापान के रेनकोजी मंदिर में नेताजी की अस्थियां होने पर कभी विश्वास था. इन सदस्यों के अनुसार (1945 के बाद) नेताजी सोवियत संघ (रूस) में थे. इसके अलावा एक जर्मन पत्रकार रेमंड शनेबल ने उन्हें बताया था कि नेता जी 1945 के बाद से सोवियत संघ में थे.

मार्च 2000 में जर्मनी में रहने वाले नेताजी के पोते (ग्रैंडनेफ्यू)  सूर्य कुमार बोस ने  न्यायमूर्ति मुखर्जी आयोग के सामने नेताजी की बातों को एक शपथ पत्र के रूप में रखा. सूर्य द्वारा दिए गए शपथ पत्र में प्रणब मुखर्जी के 1995 के जर्मनी के इस ‘गुप्त’ दौरे में घटित घटनाओं का पता चलता है.
सूर्य बताते हैं कि 20 अक्टूबर 1995 को उनकी आंटी एमिली ने ऑग्सवर्ग से अपनी बेटी अनीता के यहां से उन्हें फोन किया और बताया कि प्रणब मुखर्जी नेताजी की ‘कथित’ अस्थियों को भारत लाने के सिलसिले में अनीता और उनसे अनुमति लेने के लिए आए हैं. प्रणब उनसे एक दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर भी करवाना चाहते थे, जिसे वह भारत में उनकी अनुमति के सबूत के तौर पर पेश कर सकें. आंटी (एमिली) ने मुझसे (सूर्य कुमार बोस) दोहराया था कि नेताजी की मृत्यु हवाई दुर्घटना में नहीं हुई है. और वह न तो ऐसे किसी दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करेंगी और न ही अस्थियों को भारत या कहीं भी ले जाने के लिए राजी होंगी.
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 सूर्य के अनुसार, प्रणब मुखर्जी से अनीता और उनके पति डॉ. मार्टिन फाफ को 21 अक्टूबर को दोपहर के खाने पर बाहर मिलना था क्योंकि आंटी अस्थियों के विवाद पर बिलकुल बात नहीं करना चाहती थीं. आंटी ने प्रणब मुखर्जी से साफ़ तौर पर कहा था कि नेता जी की मृत्यु का ताइपेई में हुई  हवाई दुर्घटना और रेनकोजी  में रखी अस्थियों से कोई लेना देना नहीं है.
सूर्य को अपनी आंटी से इस मुद्दे पर फिर बात करनी पड़ी जब उन्होंने एक भारतीय अख़बार में पढ़ा कि उन्होेंने भारत सरकार को नेता जी की अस्थियों को भारत लाने की अनुमति दे दी है. दरअसल यह खबर पूरी तरह प्रणब मुखर्जी के बयान पर आधारित थी.

एमिली ने प्रणब मुखर्जी और भारत सरकार को गलत कारणों से झूठ फ़ैलाने का दोषी करार दिया था क्योंकि नेताजी  की पत्नी कभी भी जापान में

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रखी अस्थियों को लाने और भारतीयों के सामने उनको नेताजी की अस्थियां बताने के लिए राजी नहीं हुई. सार्वजानिक की गई फाइलों में ऐसा कोई दस्तावेज़ भी नहीं है, जिसमें नेताजी की पत्नी ने हस्ताक्षर कर सरकार का समर्थन किया हो. अब इसके पीछे चाहे जो कारण हों, ये तो अनीता ही बता सकती हैं कि परिवार के अन्य सदस्यों से अलग हटकर वे क्यों प्रणब मुखर्जी का साथ देने के लिए तैयार हो गयी थीं. 1996 में नेताजी की पत्नी और अपनी माँ के देहांत के बाद अनीता नेताजी की अस्थियों को जापान से भारत लाने के लिए प्रयासरत रहीं. कांग्रेस के 2004 में चुनाव जीतने के साथ ही इन प्रयासों में भी तेजी आई.

हाल ही में इंडिया टुडे को दिए इंटरब्यू में अनीता के अपने पिता की मृत्यु पर विवाद को खत्म करने के प्रयासों का पता चलता है. अनीता के अनुसार चाहे जितने भी दस्तावेज़ सार्वजनिक हो जाएं, कितने भी सबूत पेश कर दिए जाएं पर कुछ लोग उस पर कभी विश्वास नहीं करेंगे.  इंटरब्यू के अंत में  उन्होंने रेनकोजी में रखी अस्थियों की डीएनए जांच को लेकर कहा कि “वास्तव में यदि ये अस्थियां उनके पिता की नहीं हैं, तो भी यह साबित नहीं हो जाता कि 1945 में हवाई जहाज दुर्घटना नहीं हुई थी”
( लेखक अनुज धर पत्रकार हैं और “मिशन नेताजी” के संस्थापकों में हैं. मूलरुप से यह लेख अंग्रेजी में dailyo.in पर प्रकाशित हुआ था. हिंदी में इसका अनुवाद IIMC के छात्र अमन गुप्ता ने किया है)
नोट-लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. ‘चौपाल’ का इनसे कोई संबंध नहीं है.
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2 Comments


  1. // Reply

    नेता जी के नेता जी की मौत के रहस्य से पर्दा उठाना शायद ही मुमकिन हो। उसकी अनेक वजह हैं। पहली वजह है-देश की आज़ादी के आंदोलन में जिनको देवतुल्य माना गया है, उनके मखौटे उतर जाएंगे। दूसरा-कांग्रेस को मुंह छिपाने की जगह नहीं मिलेगा और तीसरा- देश पर राज करने वाले गैर-सरकारी दल भी देश की छवि को बचाने के लिए नेताजी की मौत के रहस्य के दफन रहने में ही भलाई समझते हैं। प्रणब मुखर्जी की भूमिका कांग्रेस की भूमिका से अलग से नहीं हो सकती, अलबत्ता एक बंगाली होने के कारण उनके मन में भी नेताजी के लिए अथाह श्रृद्धा होगी। नेताजी को लेकर अनेक रहस्य हैं, जैसे देश को आज़ाद करने के बदले अंग्रेजों ने नेताजी को उन्हें सौंपने की मांग की थी, स्टालिन से उनकी हत्या कराने का आग्रह किया गया था, लेकिन वामपंथी होने के कारण स्टालिन ने भेष बदलाकर उन्हें नेपाल के रास्ते भारत भिजवा दिया था और फैज़ाबाद के गुमराहा बाबा या मुथरा के जय गुरुदेव बाबा वही थे, वगैर. वगैर.।
    पुस्तक के अंश पढ़ने लगता है कि नेताजी के बारे में काफी शोध किया गया है, अनुवाद मौलिक लगता है, मेरी शुभकामानाएं.- रोशन


    1. // Reply

      गुमराहा बाबा नहीं, गुमनामी बाबा ।

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