जलता उत्तराखण्ड

–डॉ. अनिल प्रकाश जोशी

एक बार फिर जंगल की आग ने उत्तराखण्ड को बड़ी मार कर दी। जंगल तो खाक हुए ही हुए हैं पर अबकी बार आग बुझाने में कई स्थानीय 484385-forest-fire12लोगो की भी बलि चढ़ गयी। इस बार की आग मात्र जगलों के लिए ही भारी नहीं पड़ी बल्कि अबकी बार दावानल (जंगल की आग) से गावों की भी शामत आ गई है। उत्तराखण्ड के लगभग 1218 से ज्यादा स्थानो से जंगलो की आग की ख़बरें आ चुकी हैं जिसमें 3100 हेक्टयर में वन खाक हो चुके हैं। उत्तराखण्ड धुए से घिर चुका है और यह आग अभी भी थमने वाली नहीं लगती। बात मात्र यहां तक ही नहीं रही बल्कि 500 से उपर गांव भी इसके चपेट में आने के नजदीक पहुच चुके हैं। आग बुझाने को लेकर चिंतित लगभग 9 लोगों को भी आग लील गई। इसकी गंभीरता इस बात से पता चलती है कि इस दावानल में काबू पाने के लिये सेना, वायुसेना, राष्ट्रीय संकट मोचक बल (एन. डी. आर. एफ.) के जवानो को इसे बुझाने के लिए झोंक दिया गया है। गृह मंत्री भी कह चुके कि केंद्र भरपूर सहायता करेगा।

वनाग्नि उत्तराखण्ड में कोई नई घटना नहीं है। यह साल 1993, 2005, 2012 के पिछले दशकों में भारी नुकसान कर चुकी, लेकिन वर्तमान वनाग्नि ने पिछली घटनाओं को पीछे छोड दिया है। इस बार पूरा उत्तराखण्ड धूं-धूं कर जल रहा है। यह आग वनसंम्पदा का तो नुकसान कर रही है साथ में निरीह पक्षी-जानवर किस तरह से खाक हो रहे होगें, इसकी कल्पना की जा सकती है।

इस बार की यह घटना को कदापि हल्के में नही लिया जाना चाहिए। क्योंकि इसमें सवाल मात्र उत्तराखण्ड का ही नही है, वन सारे देश व पृथ्वी के पारिस्थितिक सतुंलन का एक बड़ा हिस्सा हैं, यह नुकसान इस राज्य का ही नहीं बल्कि पूरे समाज का है। इसलिए इस पर बड़ी बहस की आवश्यकता है और यह आग कुछ बड़े प्रश्न भी खड़े करती है।

uttarakhand-fire759पहला, कि इस बार तय था कि जंगल की आग नुकसान पहुंचा सकती है, खास तौर से तब जब शीत-कालीन वर्षा का नितांत अभाव था, साथ में मार्च-अप्रैल प्रचण्ड गर्मी का एहसास दिला रहे थे। एसे में वन विभाग व शासन की क्या तैयारियां थीं? क्या आग लगने के बाद ही इन्हें तत्पर होना चाहिए था? ऐसा हमेशा से होता रहा है, क्योंकि ये ना तो भूकम्प था और ना ही अचानक आने वाली बाढ़ जो बिना सूचना के आती है, इस बार इस दावानल को आना ही था क्योंकि इसके पूरे संकेत मिल चुके थे। पर हम कुछ ना कर सके। वन, गांव और जानवर सब सामने जल रहे है और हम कसमसाने के अलावा कुछ नहीं कर सकते।

अब देखिए देश के सबसे बड़े विभाग में वन विभाग भी एक है पर इस सारी प्रकिया में ये विभाग आज असहाय सा दिखता है। क्योंकि दावानल इतना बड़ा है कि विभाग के बूते से ये पूरी तरह बाहर है। दो बडे प्रश्न इसके साथ खड़े होते हैं-कि क्या हम शुरुआती दौर या उससे पहले भी ऐसी घटनाओं को रोक सकते है? दूसरा, जब ये बार-बार होने वाली घटना हो तो फिर हमारे पास कोई सशक्त, प्रभावी और दीर्घ-कालीन मास्टर प्लान क्यों नहीं है?

सच तो यह है कि इन दोनों में ही हम बहुत पीछे हैं, हमारे पास कोई भी ठोस पहल और समाधान नहीं है। हमेशा आग लगने के बाद ही हम दौड़-भाग करते है पर हर बार नुकसान अपनी जगह पूरा हो ही जाता है।

मोटे-मोटे रूप में अगर समझा जाए तो वनाग्नि इतना प्रचंण्ड रूप कुछ कारणों से ले लेती है, शीतकालीन वर्षा का अभाव वनो को सूखा छोड़ देता है और नमी का अभाव आग को पनपने का पूरा मौका देता है। इस बार के जल संकट में उत्तराखण्ड भी पीछे नहीं था। राज्य के 11 जिले सूखा झेल रहे थे। दूसरा बड़ा कारण इस बार पारे ने मार्च-अप्रैल में ही रंग दिखाना शुरु कर दिया था। इनका पूरा साथ दिया वन-क्षेत्रों में बड़ते झाड़-झकाड़ ने, जिसे वन विभाग का ही कुप्रबंधन समझा जा सकता है। लेन्टाना, पॉथेनियम, काला बांसा जैसे खरपतवार जल्दी आग पकडते हैं और अब वन भूमि पर यह ही लहलहाते हैं। ऊंचे इलाकों में में चीड़ की बड़ती पकड़ ने ही आग को पनपने का पूरा मौका दे रखा है। असल में यह प्रजाति आग के प्रति ज्यादा संवेदनशील होती है। इसका रेसिन और पत्तियां व छूयूति आग के फैलने में सबसे सहायक होती हैं। और जब इन जगलो में आग लग जाए और साथ में सूखा व गर्मी पूरा साथ दे तो मान के चलिए सब कुछ राख ही होगा।

सबसे बडी जरूरत इस बात की है कि इन बड़ती घटनाओं से कैसे छुटकारा पाएं और कम से कम कुछ अंकुश तो लगा सके। विभाग और483755-uttarakhand-forest-fire सरकार को चाहिए कि आग बुझने बुझाने तक ही सिमित ना रहे बल्कि आगे की रणनीति तय करे और इस बात पर भी बड़ा गौर करने का जरुररत है कि आखिर पिछले कुछ दशकों में यह दावानल क्यों बार-बार अनियंत्रित हो जाता है? असल में पहले गांव वनो में अपना सीधा अधिकार समझते थे। पूरा का पूरा गांव आग बुझाने के लिये कूद पड़ता था। आज कहानी कुछ और ही है। राख होते वन अब उन्हें उतना दुख नहीं पहुचाते क्योंकि उनका अपनत्व खत्म हो चुका है। अब यह जिम्मेदारी वन विभाग की ही आन पड़ती है, जिससे लगभग प्रति 80 हेक्टयर में एक फोरेस्ट-गार्ड (वन-रक्षक) होता है। वो गरीब कहां-कहां रहेगा? उसे अपनी ही जान बचाने के लाले पड़ जाते हैं। फिर वन विभाग की वो पहल भी ज्यादा रंग नहीं दिखा पाई जिसमें आग बुझाने के कार्य को प्रभावी बनाने के लिए युवाओं को जोड़ने की कोशिश की गई। इन युवाओं की भागीदारी मानदेय पर आधारित थी। जो कभी समय पर नहीं मिलता कई-कई जगह पर पिछले वर्ष के कार्यों का मानदेय भी अब तक नहीं मिला। अब ऐसे में इस वर्ष का जुड़ाव समाप्त ही होगा। दूसरी बड़ी बात विभाग व सरकार कोई भी ऐसी बड़ी योजना को जमीन पर नहीं उतार पाई जिनसे हर गांव का जुड़ाव पैदा कर पाते।

फिर हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि वन विभाग का अस्तित्व बहुत बाद में आया होगा उससे पहले वनों के प्रति गांव व उसके प्रबंधन व परंपराएं ही थीं जिनसे गांव व वन साथ-साथ पनपते थे। वन व गांव एक दूसरे के पूरक थे। आज हमने दोनों को अलग-अलग कर दिया और 50bccbf6dedb0576e81dc241d846a229दोनों के एकाकी प्रबंधन पर बल दे दिया और उस विश्वास और प्रबंधन को तोड़ दिया है जिसमें वनों और वासियों को जोड़ रखा था। अब एक नए सिरे से ये वन प्रबंधन व कानूनों पर बहस की आश्यकता का समय आ चुका है। वनों के उत्पादो और प्रबंधन में जब तक स्थानीय भागीदारी नहीं होगी तब तक हम इस दावानल से नहीं लड़ पाएंगे। 1980 के वन-अधिनियम व ऐसे कानूनों पर एक नए सिरे से चर्चा होनी ही चाहिए कि जब कानून व विभाग वनों की रक्षा नहीं कर सकता तो फिर इसके बदलाब के प्रति हम चितिंत क्यों नही होते या फिर कानून व विभाग के भरोसे वनों को जलता-मरता छोड़ देंगे? उन सब कानूनो की समीक्षा का समय आ चुका है जो कभी भी वन-वनवासियों के हित में खरे नहीं उतर पाए हैं।

 

(लेखक डॉ. अनिल प्रकाश जोशी पदमश्री विजेता, पर्यावरणविद और जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)[sgmb id=”1″]

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