जन्मदिन विशेष: जो नेहरु जी ने 1947 में किया, वह अटल जी ने 1984 में किया

कुछ याद करने की कोशिश कीजिए। विभाजन की एक तस्वीर… जवाहर लाल नेहरु ‘प्रधानमंत्री’ जवाहर लाल नेहरु हो चुके थे। देश रक्तरंजित विभाजन की पीड़ा सह रहा था। धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा में दोनों ओर लोग कट-मर रहे थे। राजधानी होते हुए, दिल्ली इससे प्रभावित ना हो, ऐसा नहीं हो सकता था। हुआ भी नहीं।

इलाका था चांदनी चौक। दंगाइयों की भीड़ दूसरे धर्म के मानने वालों पर हावी थी। प्रधानमंत्री पंडित नेहरु का निकलना हुआ। नेहरु ने आव देखा ना ताव… गाड़ी से उतरे, एक सिपाही से उसकी लाठी छीनी और खुद ही भीड़ को खदेड़ने लगे। यह किस्सा हम सबको याद है। गूगल पर मेहनत करेंगे, तो तस्वीर भी मिल जाएगी। लेकिन अब जो याद नहीं, उसकी ओर चलते हैं। एक ऐसे नेता को याद करने का वक़्त है जिसके बारे में इन्हीं पंडित नेहरु ने कुछ ‘बहुत अच्छा’ कहा था…

समय बदला, परिस्थितियां बदली, नेता बदले लेकिन धर्मों के बीच होने वाले झगड़े बकाया थे। सन 1984 की बात है। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की, उनके ही सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या किए जाने से पूरे देश में सिखों के खिलाफ़ दंगे हो रहे थे। नए-नए प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी के लिए “बड़ा सा पेड़ गिरा था तो धरती हिलनी” स्वाभाविक थी। राष्ट्रीय लोक-प्रसारक दूरदर्शन और आकाशवाणी के हिसाब देश में सब कुछ ‘शांत’ था।

सरकारी दस्तावेजों में हिंसा में मरने वालों की संख्या 3000 के आसपास थी, जबकि हक़ीक़त में राजधानी में 8000 से अधिक लोग मारे गए थे (यह किताब के लेखक का दावा है)। अटल बिहारी वाजपेयी को उस वक़्त लुटियंस दिल्ली के रायसीना रोड पर 6 नंबर आवास आवंटित था। पूरी दिल्ली जल रही थी, तो आग की लपटें यहाँ भी पहुँच गईं।

आज अगर आप लुटियंस इलाक़े में टहलें तो आप कई जगह टैक्सी स्टैंड देख सकते हैं। तब भी ऐसा हुआ करता था। अटल जी अपने आवास पर थे। उन्होंने जब सुना कि दंगाइयों का एक जत्था सिख टैक्सी ड्राइवरों के पीछे पड़ा है और ये लोग उनसे मदद मांगने आए तो अटल जी अपने आवास से निकले। हाथ में नेहरू जी की तरह कोई लाठी नहीं थी लेकिन हौसला… हौसला, शायद उससे भी ज्यादा था! दंगाइयों और सिख ड्राइवरों के बीच मानो कोई दीवार आ गई और दंगाइयों से ललकार कर कहने लगी “तुम इन्हें तभी छू सकते हो, जब मुझे ख़त्म कर सको”
दंगाई कुछ समय के लिए विचलित हुए। लेकिन उन्होंने पलटकर कहा… “तुम बीच से हट जाओ और उन्हें उनका ‘काम’ करने दो”। लेकिन धुन के पक्के अटल जी ना मानने वाले थे, ना माने।

यह बहस चल ही रही थी कि आवास पर ड्यूटी पर तैनात एक मात्र सिपाही ने सहायता के लिए फोन कर दिया। पुलिस जब तक आई, वाजपेयी जी, वहीं डटे रहे और अंततः वे उन सिख ड्राइवरों को बचाने में कामयाब रहे।

अटल जी के ऐसे साहस की कहानी काटूनिस्ट और पत्रकार रहे राजिंदर पुरी भी सुनाते हैं। पुरी के अनुसार वे उस वक़्त अटल जी के आवास पर ही थे। तभी देखा कि उसी रास्ते में भीड़ एक कार को घेरे है। भीड़ के पास पैट्रोल की कैन थी। कार में सिख ड्राइवर था। अटल जी बाहर आकर उन पर चिल्लाए।

ऐसा नहीं है कि अटल जी पंजाब में जो कुछ हुआ, उसके बाद ऑपरेशन ब्लू स्टार के ख़िलाफ़ थे। उन्होंने सेना के अदम्य साहस और पराक्रम की तारीफ़ की थी। लेकिन उनके प्रश्न भी थे कि हम यहाँ तक आए कैसे? यह आग पहले पंजाब में और फिर दिल्ली में पहुँची कैसे?

(स्रोत: अटल जी से संबंधित कहानी लिए प्रस्तुत आलेख उल्लेख एन. पी. की किताब द अनटोल्ड वाजपेयी’ से लिया गया है। यह किताब पेंग्विन बुक्स प्रकाशन से प्रकाशित है)

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